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लोकसाहित्य और दलित आदिवासी स्त्री की अभिव्यक्ति

11 Jan 2016

Image Courtesy: Jiaur Rahman: Tribal Dance
 
किसी भी देश के लोकगीतऔर लोकगाथाएं उस देश की आम जनता की भावना, संस्कृति, राग-द्वेष, दुख दर्द, भावनाओं और उनकी सांझी विरासत का दर्पण होती है। लोकगीत और लोकगाथाओं का सृजन आम जनजीवन कीभावनाओं की उन्मुक्त स्थिति है। समाज में जैसा भी अच्छा-बुरा, सुंदर-असुंदर, रहा है, उसके प्रति साधारण जन मानस की भावनाएं लोकसाहित्य में ही दिखती है। लोकसाहित्य से ही जन मानस के दुख-दर्द, आशा-निराशा, पीडा, संवेदना, छटपटाहट-चिंताएं, कष्ट और जीवन के प्रति उनका दर्शन समझना संभव है। लोकसाहित्य का आधार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु की समाप्ति तक के दर्शन से जुडा होने के कारण इसमें कहीं हर्षोल्लास के क्षण हैतो कहीं दु:ख के बादल मंडराते है। लोकसाहित्य का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इसके मूल में मनुष्य होने की का दर्द छिपा है।

स्त्री के संदर्भ में लोकसाहित्य की सबसे बडी विशेषता उनके मनुष्य होकर भी, मनुष्य के समान ना जीने के अवसर मिलने की पीड़ाऔर उसके अनुभव का व्यक्त होना है। और स्त्रियों में खासकर दलित और आदिवासी स्त्री के साथ तो यह पीड़ा बहुत ही मर्मांतक है। दलित आदिवासी स्त्री जिस ब्राह्मणवादी पुरूषसत्तात्मक समाज में जी रही है, वह उसे निम्न से भी निम्नतर श्रेणी में जीने को मजबूर करता है। लोकसाहित्य दलित आदिवासी स्त्री की अस्मिता, उसकी पहचान से जुड़े गीत, कहानियां उसके प्रति बरती जा रही अमानवीय क्रूरता, उपेक्षा, हिंसा और भेदभाव की पोल पट्टी खोलते हुए, उसके समर्थन में आकर समाज को चुनौती देता है। दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।

लोकसाहित्य जनमानस की धड़कन होते हुए भी समाजिक उपेक्षा के शिकार रहे है। इसका कारण है लोकसाहित्य का जनमानस से जुडा होना। लोकसाहित्य अपनी सहज अभिव्यक्तीय क्षमता और संपेक्षणीयता के कारणशास्त्रीय साहित्य को हमेशा टक्कर देता रहा है। एक तरफ शास्त्रीय साहित्य हमेशा सत्ता- वैभव- शक्ति सम्पन्न और वर्णव्यवस्था के हिमायती झंडाबरदारों द्वारा पोषित रहा है, दूसरी तरफ लोकसाहित्य आम जन द्वारा अपने द्वारा रोज रोज जिए जा रहे संघर्ष, अनुभव और स्वभाव की सहज सरल संपदा से परिपूर्ण रहा है। शास्त्रीय साहित्य और उसकी कलाएं एक नियम, अनुशासन, रीति से बंधी होती है जबकि लोकसाहित्य भावनाओं की मुक्त-स्वछंद और स्वतंत्र अभिव्यक्ति है। इसीलिए लोकसाहित्य मेंजहां एक ओर आम जनमानस का खुशी से नाचता-झूमता रूप नज़र आता है वहीं दूसरी ओर वह अपने रूदन को भी उतने ही सहज रूप से अभिव्यक्त करता है।

दलित साहित्य में अभी लोकसाहित्य पर काम होना बाकी है।पर सवाल यह है कि दलितों- आदिवासियों के बीच बिखरा पड़े लोकसाहित्य का संग्रह कैसे किया जाए? मेरा मानना है कि दलित- आदिवासी समाज की मनोदशा और उसकी स्थिति को समझने में लोकसाहित्य की बहुत बडी भूमिका हो सकती है, इसलिए इस दुश्कर लेकिन इस अति महत्वपूर्ण और रोमांचकारी काम को सामाजिक काम या सामाजिक उत्तरदायित्व समझकर करना पडेगा।

एक समय लोकगीतों का संकलन काग़ज की बरबादी माना जाता था परन्तु बाद में विख्यात साहित्यकार रामनरेश त्रिपाठी और देवेन्द्र सत्यार्थी आदि ने अपने हाथ में बीड़ा लिया और जगह-जगह घूम-घूम कर इन गीतों को संग्रह किया। आज भी अगर लोकमानस की नस पहचाननी है तो हमें लोकगीतों का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि लोकगीत उनकी धड़कन में बसे है। जहाँ आदिवासी लोकगीतों की रचना उनकी संस्कृति और उसके रहन सहन, उनके जल जंगल जमीन से जुड़ाव के गीत है तो वहीं दलित समाज के गीत, समाज में अन्याय, पीड़ा अभाव और मजबूरी में बने रचे। आदिवासियों के जीवन में अशिक्षा, गरीबी उनके शरीर में खून की तरह घुल-मिल गए है । लोकगीत समाज में व्याप्त भेदभाव, शोषण, उत्पीड़न की बेबाक अभिव्यक्ति करते है। अधिकतर लोकगीत कन्या विवाह व कन्या विदाई से सम्बन्धित है, परन्तु कहीं-कहीं कन्या के जन्म पर भी गीत मिल जाते है। आश्चर्य की बात है कि जहां पुत्र जन्म या पैदा होने के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों की भरमार है, वहीं कन्या जन्म पर मुश्किल से एका-आध ही गीत मिलते है और वह भी कन्या पैदा ना करने के बारे में, या कन्या पैदा होने पर माँ दादी दादी पिता के मायूस होने व दुखी होने की स्थिति को ही अधिक दर्शाते है।आखिर हमारे समाज में हर कोई चाहे वह शिक्षित तबका हो या अशिक्षित, सबको पुत्र प्राप्ति की कामना ही क्यों रहती है? समाज में यह पितृसत्तात्मक मूल्य कूट कूट कर भरा गया है कि पुत्र ही वंश-वृद्धि और मोक्ष का द्वार है, मृत माता-पिता को कंधा देकर वहीं उन्हे स्वर्ग की सीढियां चढवाता है। इसलिए पुत्र होने पर स्त्री भाग्यशाली और पुत्री होने पर तरह-तरह के तानों से नवाजी जाती है। पुत्र पैदा होकर उसे जग हँसाई से बचाता है। दुनिया में उसका रूतबा बढ़ाता है। यही कारण है कि पुत्रों की कामना में वह व्रत रखती है मनौतियां मानती है। दूसरी ओर जब लड़की होती है तो शोक मनाया जाता है। समाज में लड़की पैदा होने को इस तरह बताया जाता है मानों लड़की होना माने 'कुछ नहीं होना' है। पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है। पुत्रियों वाला पिता, बाकी पुरुष समाज द्वारा या पूरे समाज दवारा हेय अथवा दया की देखा जाता है और अक्सर उपहास का कारण बनता है। जबकि यह एक वैज्ञानिक कारण है कि पुत्र और पुत्री होना ना तो औरत के हाथ में है ना ही पुरुष के हाथ में। फिर भी समाज में तरह तरह के अंधविश्वास और भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिस में दोष सिर्फ और सिर्फ स्त्री के सिर ही मढा जाता है।

बन्जारा समाज में भी पुत्री जन्म के समय थाली और पुत्र जन्म के समय नगाड़ा बजाया जाता है।घऱ में बच्चा( पुत्र) पैदा होने के छठे दिन छठी मनाई जाती है। छठी माता की पूजा की जाती है तथा पुत्र के लिए तरह-तरह की दुआएं मांगी जाती है। छठी माता से अनुरोध किया जाता है कि आगे भी उसे पुत्र ही देना पुत्री नहीं देना।नीचे दिए गए बंजारा लोकगीत में एक स्त्री कहती है,“हे ! जन्म देने वाली देने वाली देवी! सन से सुतलीकातने तथा बुनने वाली पुरूष जाति को स्त्री के गर्भ से जन्म देना , सुई-धागे से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को हमारे कोख से जन्म न देना"

वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
सण ढेरो लेन वर आयेस
सुई दोरा लेन पर आयेस
सुओ सुतली लेन वर जायेस
लेपो लावण लेन पर जायेस
वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
           (बंजारा जाति, समाज और संस्कृति यशवन्त जाधव, वाणी प्रकाशन पृष्ठ 25-26)

अब क्या कारण है कि इस देश की धरती पर एक स्त्री दूसरी स्त्री का जन्म ही देना नही चाहती ? क्या इसका कारण परिवारों में महिलाओं का पितृसत्ता के कलंक में अपने हाथ रंगना, स्त्री होने की पीड़ा से अपनी बेटी को बचाना है, या फिर दहेज प्रथा या महिलाओं की समाज में सबसे निम्नतम जगह होना है अथवा कुछ और?बन्जारा जाति में औरतों का जीवन जीवट भरा होता है। घर के अधिकांश काम जिनमें घर-बाहर के सारे कामकाज के साथ-साथ अपने खुद के कपड़े भी स्वयं सीना भी शामिल है, सब उसे ही करने पड़ते है। पुत्री के विवाह के समय उसका वर पक्ष से मूल्य लेना क्या एक बंजारा औरत को आहत नही करता होगा, जब उसके कौमार्य को, उसके स्वाभिमान को, कुछ रूपयों में पति रुपी मर्द के हाथ में बेच दिया जाता है? उसे दिनभर लोहे की बड़ी-2 भट्टियों में तपना पड़ता है। लोहे के हंसिये, तवे, चिमटे बेचने के लिए, बाजार में बेठकर सभ्य समाज की गन्दी निगाहों का शिकार होना पड़ता है, शायद उसकी यही व्यथा गीतों में फूट पड़ती है कि सूई से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को धरती पर जन्म मत देना।

पर बेटी होने की अपनी खुशियां भी है। कहीं कहीं लोकगीतों में बेटी होने का जश्न या खुशी भी दिखती है, पर वह क्षणिक ही होती है, जैसे इस लोकगीत में जिसमेंकबदायूं क्षेत्र की एक गर्भवती बहू भगवान से बेटी देने की इच्छा प्रकट करती है-

मैं तो पहले जनौगी धीयरी,
मेरी जौ कौख होय सुलच्छनी।।
जाकी गरजति आवैगी बराइति री,
पालिकी चढ़ि आवै साजन

परन्तु तुरन्त ही उसे यह अहसास हो जाता है कि बेटी तो ब्याह के अपने घर चली जायगी। घर और मेरी कोख दोनों खाली हो जायेगी। इसलिए मैं बेटी ना जनके बेटा जनूंगी जिससे मेरा घर भरा पूरा रहे। बहू घर में रूप भरती हुई घर में डोलेगी। महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य यह है कि लोक साहित्य में जहाँ कन्याजन्म की चर्चा बहुत ही कम है जबकि पुत्र जन्म के ऊपर हजारों गीत हैं, दूसरी ओर कन्या के विवाह को लेकर अनगिनत गीत मिलते है। एक लोकगीत में कन्या अपने पिता से सवाल पूछती है,“हे ! पिताकौन ग्रहण रात में लगता है? कौन दिन में? और कौन ग्रहण बेवक्त लगता है? और कब छूटता है?”पिता अपनी पुत्री के सवालों का जबाब देता हुआ कहता है,“हे बेटी! चन्द्र ग्रहण रात में लगता है और सूर्य ग्रहण दिन में। कन्या ग्रहण का कोई ठिकाना नहीं कि कब लगे और कब छूटे?”

आदिवासी समाज में भी जन्मगीत खूब मिलते है परन्तु आदिवासी समाज में लड़की होना उतनी शर्म की बात नहीं जितना की अन्य समाज में। इसका कारण शायद यही है कि आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुषों के संबंधों में कुछ तो समानता रही ही है। एक मुण्डा लोकगीत जिसमें एक स्त्री अपनी पुत्री की जन्मk संबंधी जिज्ञासा शांत करते हुए कहती है कि-जब लड़का पैदा होता है तब सूर्य उगा, जब चांद उगा तू लड़की पैदा हुई। जब लड़का पैदा हुआ तब गोहाल उजड़ गया और जब लड़की पैदा हुई तब गोहाल भर गया।

 

दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।


दलित स्त्रीजाति के बाण से किस प्रकार घायल होती है, वह अपने दलित होने की सजा हमेशा पाती है। एक तरफ उसे दलित समझकर उसको उपभोग की वस्तु समझा जाता है तो दूसरी और उसको सबसे ज्यादा सामाजिक हिंसा का शिकार होना पडता है। सवर्ण समाज के स्त्री पुरुष दोनों ही उसको तरह तरह से उत्पीड़ित करते है। वह जीवन के प्रत्येक स्तर पर जातीय भेदभाव, धार्मिक पाखंड तथा अंधविश्वास झेलती है।दलित औरतों का किस प्रकार यौन शोषण किया जाता है, उनकी गरीबी का, उनके देह का इस्तेमाल किस कदर किया जाता है,इसका एक मैथिली गीत 'भंडौवा' में छूआछूत मानने वाले एक ब्राह्मण के इसी स्वरूप का पर्दाफाश किया है। जिस ब्राह्मण की बात बात किसी के स्पर्श मात्र से ही जात चली जाती है, उसी ब्राह्मण का दलित स्त्री के साथ जबर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाने से, उनका चुंबन लेने से जाति नही जाती है। दलित स्त्रियां ऐसे ढोंगी ब्राह्मण पर ताने कसते हुए और उसका मजाक बनाते हुए कहती है कि-  

अरे हो बुडबक बमना, अरे अरे हो बुडबक बमना
चुम्मा लेते में जात नहीं जाएं रे।
सुपति- मडनियां लाए डोमिनियां, मांगे प्यास से पनियां
कुआं के पानी ना पाए बेचारी, दौड़ल कमला के किनरियां,
सोही डोमनियां जब बनली नटिनियां, आंखी मारे पिपनियां?
ते करे खातिर दौड़ले बौड़हवा, छोड़के घर में बमनियां।
जोलहा, धुनिया, तेलनियां के पीए न छुअल पनियां
नटिनी के जोबना के गंगा जमुनुवां में डुबकी लगा के नहनियां।
दिन भर पूजा पर आसन लगा के पोथी पुरान बचनियां
रात के ततमा टोली के गलियन में जोत खीजी पतरा गननियां
भकुआ बमना चुम्मा लेवे में जात नहीरे जाए।

 -(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना- विश्वमित्र उपाध्यय पृ.स.18 प्रकाशन विभाग)
ऐसे ही एक गरीब दलित महिला जब गांव की सभी गैर दलित महिलाओं को त्यौहार पर सुंदर सुंदर कपडे पहने देखती है तो अपनी सहेली से कहती है कि- कार्तिक माह में सब महिलाएं अच्छेवस्त्र पहनकर स्नान करने जायेगी। परन्तु मैं तो फटा पुराना वस्त्र पहनकर ही जाऊंगी क्योंकि मेरे पास अच्छे वस्त्र नहीं हैं-
कातिक हे सखि पुन्य महीना, सखि
सब कोई पहिने पाट पंय्बर
हम सखि गुदरी पुरान है।।
पूस हे सखि ओस पड़ि गेल,
भीजि गेल लामी लामी केश है।
जाड़ा छेदे, तन सुई सन छन छन
थर थर कांपई करेज हे।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना पृ.स.16, प्रकाशन विभाग)

अकाल, भूख, गरीबी, अभाव की मार सबसे ज्यादा गरीबदलित तबके की स्त्री को ही झेलनी पड़ती है। दलितों के पास ना तो अपनी जमीन होती है और ना ही खेत-खलिहान होते है। सौ मेंनब्बे प्रतिशत खेतिहर मजदूर- किसान, असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूर दलित समाज के ही होते है। इन दलित आदिवासी भारतीय मजदूरों की हालत किसी से छिपी नही है। वे बेहद गंदे और छोटे घरों में रहते है. जहां बिजली, पानी, हवा, स्कूल, अस्पताल आदि किसी भी तरह की व्यवस्था नही होती। पुरुष कामगारों से भी अधिक स्त्री मजदूर कामगारों की हालत खराब होती है। ना उन्हे मजदूरी ठीक से मिलती है और ना ही एक कामगार के बराबरी का रुतबा और ना ही सम्मान । ऐसे में वह घर से लेकर बाहर तक शोषण अन्याय उत्पीड़न की चक्की मे रात-दिन पिसती है। ऐसी ही परिस्थितियां झेल रही एक श्रमिक महिला समाज से सवाल करती है कि वह कड़ी धूप में जब मिट्टी तोड़ रही है, उसके पास इतनी मेहनत करने के बाद भी ना पहनने को पूरे कपड़े हैं और ना ही भूख मिटाने का खाना. जब वह पसीने और मिट्टी से तरबतर है तब मालिक और अमीर लोग अपने अपने घरों में गट्ट-गट्ट खाना खाकर आराम से सो रहे है। 

अंग पर अंगिया नही, भूखी प्यासी मैं
गिट्टी तोड़ती हूँ इस भरे घास में
पत्थर की किरच छक की आवाज़ से
मेरे शरीर पर टकराती है,
मेरा जीवन हराम है।
अंग पर पसीना छक छक करता है
नयनों से आंसुओं का परनाला बहता है।
ओ मां मेरे शरीर पर मिट्टी खप से चुभ जाती है।
रक्त की धार बह उठती हैं
पैसे वाले गट्ट गट्ट खाना खाकर
घर पर आराम करते है।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना वही पृष्ठ 161)
 
सर्दी गर्मी बरसात चाहे कोई मौसम हो हरेक मौसम में गरीब दलित आदिवासी लोगों का जीवन दूभर होता है। सर्दी की विभीषिका को झेलते हुए एक मुंडा आदिवासी स्त्री कहती है-
हाय जाड़ा तुम चले जाओ।
हाय ठंड तुम उठ जाओ.
हे जाड़ा तुम उन व्यापारियों के पास चले जाओ
हे ठंड तुम उन सौदागरों के पास चले जाओ
जिनके पास मोटे कपड़े है
( बांसुरी बज रही है- मुण्डा लोकगीत- पृष्ठ 136, श्री जगदीश त्रिगुणायत)
 
अधिकांश लोकगीतों में सास, ननद, पति, ससुर, देवर के नाकारात्मक चित्र है। दरअसल सास ससुर, देवर नंद और पति यह सब लोग भारतीय परिवारों में पितृसत्तात्म मूल्यों के प्रहरी बन असहाय स्त्री पर जुल्म करते है। यह जातिवादी भारतीय मानसिकता ही है कि ताकतवर कमजोर पर अत्याचार करने में अपनी शेखी समझता है। चूंकि बहु को विवाह करके लाया गया है, उसे अच्छी तरह तोल-मोल और देख-दाख के परिवार के लिए लाया गया है इसलिए उस से रात-दिन काम करवाकर, उसके साथ खरीदी गई दासी की तरह बर्ताव करने का अधिकार अनचाहे ही पूरे परिवार को मिल जाता है ।ज्यादातर लोकगीतों में भाई अपनी बहन के लिए, बेटा अपनी माँ के लिए तो कहीं-कहीं बेहद संवेदनशील दिखाई देता है, पर वह अपनी पत्नी के लिए वैसा स्नेह, सुरक्षा की भावना, संवेदनशीलता नही जुटा पाता है। जैसे ही उसकी पत्नी बच्चे के रुप में बेटा नही जन्मती, पत्नी के रुप में उसके माता पिता की सेवा नही करती, या घर के काम काज को परिवार के मानदण्डो पर पूरा नही करती, वैसे ही पति उसका किसी बहाने परित्याग, या फिर दूर नौकरी के बहाने से उसे छोड कर चला जाता है। बहुत सारे लोकगीतों में पति के खिलाफ एक पत्नी के दुख दर्द और वेदना ही प्रकट हुई दिखती है।एक निमाड़ी गीत में पति को पंखा करते समय पत्नी को नींद आ गई तो उसे उसका पति उसे बुरी तरह से पीट देता है।

धणियेर राजा सोया सुख सेज
रणुबाई रीझ रणों जी.
डोलत जे डोलत आई गई झपकी
हाथ का रीझणों, भुई गिरयो जी
धणियेर राजा की खुलि गई नींद,
तड़ा  तड़ मारयो  ताजणी ।
(पृष्ठ संख्या-110, लोकगीतों में वेदना और विद्रोह- संपादक माता प्रसाद, सम्यक प्रकाशन)

दलित समाज में अपना हास्य-बोध, सौन्दर्य-बोध और प्रेम-बोध है। जहां गैर दलित लोकगीतों में पति के अत्याचार वाला रूप प्रमुख है पर दलित स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों में पति-पत्नी के हास्य विनोद, प्रेम-स्नेह, लड़ाई- झगड़े के चित्र भी खूब दिखाई देते है। दलित समाज में गाए जाने वाले गीतों में दहेज-प्रताड़ना के गीत कम है, क्योंकि इस समाज के पास देने के लिए दहेज है ही नही।दलित आदिवासी परिवारों में अभी भी स्त्री-पुरुष समानता के कुछेक तत्व बचे हुए है। एक लोकगीत में पति पत्नी के बीच आपस का प्यार इस प्रकार प्रकट हुआ है-

मैं बड़ी दूर से आया, मेरो गोरी.. मुन्डसे बीच नगीना
मैंने ऐसा पंखा डोला, जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसी करके राखियों, मेरा राजा, जैसे गूंठी बीच नगीना
मैं बडी दूर से आया, मेरो गोरी, सुरमें बीच सपीना
मैंने ऐसा पंखा डोला जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसा करके रखियों, मेरा राजा, जैसा किंगूठी बीच नगीना
( पृष्ठ संख्या 146, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

पति के बाहर कमाने के लिए जाने पर पत्नी का उसके साथ जाने की बात पर अड़ना, उससे लडाई झगडा करने वाली भावनाओं पर बहुत सारे लोकगीत है। इन लोकगीतों में पति के बाहर जाने पर पत्नी का अकेले पड़ जाने का भय, तथा ससुराल के अत्याचार झेलने का डर स्वाभाविक दिखता है। अक्सर होता भी यही था कि जिसमें पति बाहर नौकरी करने चला जाता है फिर अपनी ब्याहता औरत को सुध नही लेता था। आदमी के लिए बाहर की दुनिया है तो औरत के लिए घर की घुटनभरी दुनिया। ऐसे ही एक लोकगीत में कमाने के लिए परदेश जा रहे पति के किसी भी शर्त पर जाने के लिए एक ब्याहता स्त्री कहती है-

'अपने बलम की टोपी बनूंगी, जुल्फो में रहूंगी रे
मेरे राजा फूल गुलाब के, गुलकन्द बनूंगी रे
मैं रो रो अखियों लाल, बलम तेरे साथ चलूंगी रे
अपने बलम का सुरमा बनूंगी रे, डोरों में रहूंगी रे
मैं रो रो अंखियों लाल, बलम तेरे संग चलूंगी रे'
( पृष्ठ संख्या 149, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
पति के परदेश जाने पर, औरत अकेली हो जाती है ऐसे में उसके अकेले पड़ जाने पर अक्सर परिवार के ही दूसरे लोग चाहे वह पड़ोसी हो या रिश्तेदार, या फिर अपने ही घर के सगे-संबंधी, वे इन अकेली पड़ गई औरतों का जबर्दस्ती फायदा उठाने में कोई कोर कसर नही छोड़ते। छोटे भाई के कमाई के लिए परदेस जाने पर, बडा भाई यानि जेठ कैसे छोटे भाई की बीबी को छेडता है इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन एक लोकगीत में मिलता है। जेठ की शिकायत करने पर परिवार का कोई सदस्य उसको उसकी इस हरकत के लिए नही रोकता, अपितु बहु को ही दोष देने लगता है। यहां तक कि बहु को अपनी रक्षा करने के लिए जेठ पर तेल छिड़क-छिड़क कर मरने मारने की भी धमकी देने का असर नही होता -

पकड़ आम की डाली, धनि क्यूं खड़ी
का तुझै लगा है बैराग, ता का मैथिली हारी
चला जा रे मूरख गंवार, तुझे मेरी का पड़ी
मेरे राजा गए परदेश, अन्देसे में मैं खड़ी
गंगा रे जमन के बीच, जउड़े दो मक्खियां
अरे देख राजा तेरी बाट, दुख मेरी अंखियां।
मैं गम गम कोठे चढ़ गई री, मेरे हाथ में घड़ी।
पीछे से जेठा चढ़ गए री, मेरी बईया पकड़ी।
घरों में बैठी सासल, मैंने उनसे कहीं
मना लो अपने पेटा ने,मेरी बईया पकड़ी
म्हारा क्या इसमें दोस, तू ता सुथरी घणी।
आजा रे मेरे जेठा, जोड़ी अजब मिली।
छिड़कूंगी मटिया का तेल, बोतल आले में धरी।
( पृष्ठ संख्या 151, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

 

पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है।

 
मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन के लेखक डॉ. देवी सिंह ने दलित समाज में प्रचलित ऐसे लोकगीतों का संकलन किया है जिसमें दलित समाज की स्त्रियां अपने परिवार में अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं को खुलकर बताती है। उनके इच्छाओं आंकाक्षाओं पर परिवार के द्वारा रोक ना होकर अपितु इन इच्छाओं को पूरा करने में सहयोग ही दिखाई देता है। निश्चय ही दलित समाज में दलित स्त्री की आजादी के लिए बंधन उतने कठोर नही रहे है जितने कि सवर्ण समाज में रहे है। लोकगीतों में कुछ ऐसे भी गीत है जहां कुंवारी लड़किया अपने होने वाले पति से मिलना चाहती है या फिर उन्हें किसी से प्रेम हो जाता है तो वे उसके साथ जाना चाहती है। वह किसी से छुपकर या छुपाकर नहीं बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को बताकर मिलने जाना चाहती है।

कमला लिकड बाग ते, बाग में कौन बटेऊ सै
अम्मा बैल्ले में दूध सेल्ला, बाग में तेरा जमाई सै
मेरी अम्मा रान्धे दाल, भावज मेरी मान्डे पोवे सै
मेरी लाई कई कसार, सखी मेरी तेल दिखावै सै
मणे पहरी रेशमी सूट, के झिल मिल होरी सै
मणे ओड़ी काल बेल, के झिलमिल होरी सै
मणे दिया सीट पे पैर के गाड़ी चालू हो री सै
छोरूं ने मारी किलकारी , है रै र र होरी सै
( पृष्ठ संख्या 140, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
इसी तरह एक और लोकगीत में विवाह से पूर्व लड़की अपनी दादा-चाचा-ताऊ से अपने होने वाले दूल्हे से मिलने के लिए जाना चाहती है तो वह अपने चाचा ताऊ दादा से अरज करती है कि मेरे होने वाले पति बाग में आ गये है मैं उनसे कैसे मिलने जाऊ ? तब चाचा ताऊ और दादा लड़की को उसके भावी दूल्हे से मिलने के लिए मालन और धोबिन बनकर जाने के लिए कहते है -
लाडो बेटी अरज करे दादा से, मैं किस विद देखन जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।
हाथ छबडियां फूलन की है , लाडो मालनियां बनके जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।।
बोल गये बतलाए गये बागन मैं,
मेरी हलद चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये बागन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये बागन मैं
लाड़ो अरज करै बाबा से, मैं किस विद देखन जाऊं
रंगीले आ गए बागन में
जल का लोटा हाथन में लाड़ो धोबनियां बन के जाओ।
छबीले आ गये तालन में
बोल गये बतलाय गये तालन में
मेरी सीरी चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये तालन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये तालन मैं
( पृष्ठ संख्या 143, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
ऐसी गीतों की रचयिता स्वयं औरतें ही रही है और वे इन्ही गानों के माध्यन से अपने मन की इच्छाओं को बताती रही है। दलित-आदिवासी स्त्रियों की एक बडी खूबी है कि वे अपने जीवन को पूरी जीवटता से जीती है। वे किसी भी परिस्थितियों में हार नही मानती है। झलकारी बाई, फूलो झानो,सिनगी दई, ऊदादेवी पासी, महावीरी देवी से लेकर फूलन देवी तक दलित आदिवासी स्त्रियां असख्य की संख्या में हमारे सामने शूरवीरता की मशाल लेकर खडी है। यह स्त्रियां जितनी जाबांज, जितनी मेहनती होती है उतनी ही हास परिहास में भी माहिर होती है। अगर किसी को देखना हो तो इनके हास-परिहास व इनके व्यंग्य की मारक क्षमता लड़के के विवाह में बारात जाने के बाद देखी जा सकती है जिसमें बारात में ना जाकर घर पर रुकी औरतें मिलकर विवाह की पैरोडी बनाकर नाटक की तरह खेलती है। जिनमें उनकी हंसी के पात्र पंडित-जमींदार- शोहदे से लेकर ऐसे लोग बनते है जो उनको किसी तरह तंग या बुरी निगाह से देखते है। समाज में फैली कुरीतियां भी इनके व्यंग्य की धार से लहुलुहान हो जाती है।

ऐसे ही एक लोकगीत में एक पत्नी अपने पति के साथहास्य-विनोद करती हुई और पति को जलाने, चिढ़ाने के लिए अपने देवर का सहारा लेती हुई कहती है -
मेरे राजा ने बाग लगाय दिया रै,
छोटे देवर ने नीमड़ी लगाई रै।
मन रसिया, रसिया रे, गेटूरा रै।।
राजा के बागों में ना जाऊं रै।
छोटे देवर की नीमड़ी की नीमड़ी में सोऊ जाय रै।
( पृष्ठ संख्या 145, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

इसमें कोई संदेह नही कि अगर दलित-आदिवासी संस्कृति की खोज करनी है, दलित-आदिवासी समाज को समझना है तो हमें लोकसाहित्य को खंगालना पड़ेगा। क्योंकि लोकसाहित्य मनुष्य के आपसी संबंधो से लेकर उनके सामाजिक व्यवहार, उनके प्रति बाकी समाज का रवैया, उनकी परंम्पराएं, उनके हर्ष-विषाद के क्षण को खोजने की कुंजी है। सबसे पहले किसी समाज को जानने के लिए सबसे प्राथमिक तथ्य उनकी अपनी वाचिक और मौखिक परंपरा ही होती है। खासकर ऐसे समाज की मनोदशा को जनाने के लिए, जिस पर सदियों से जुल्म अत्याचार, भेदभाव, शोषण होता रहा हो. जो मात्र दलित समाज में जन्म लेने के कारण ही प्रत्येक मानवीय अधिकार से दूर कर दिए गए। जिनकी हालत जानवरों से भी बदतर कर दी गई हो। जिनके शरीर के साथ दिमाग को भी गुलाम बना लेने का पूरा षड़यंत्र रचा जाता रहा हो। ऐसे समाज को जानने के लिए उस समाज की लोकसाहित्य की परम्परा को पढा जाना, उसे लिखा जाना और उसे स्थापित किया जाना बेहद जरुरी है।

(अनिता भारती सुप्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता है।)

 
 

लोकसाहित्य और दलित आदिवासी स्त्री की अभिव्यक्ति


Image Courtesy: Jiaur Rahman: Tribal Dance
 
किसी भी देश के लोकगीतऔर लोकगाथाएं उस देश की आम जनता की भावना, संस्कृति, राग-द्वेष, दुख दर्द, भावनाओं और उनकी सांझी विरासत का दर्पण होती है। लोकगीत और लोकगाथाओं का सृजन आम जनजीवन कीभावनाओं की उन्मुक्त स्थिति है। समाज में जैसा भी अच्छा-बुरा, सुंदर-असुंदर, रहा है, उसके प्रति साधारण जन मानस की भावनाएं लोकसाहित्य में ही दिखती है। लोकसाहित्य से ही जन मानस के दुख-दर्द, आशा-निराशा, पीडा, संवेदना, छटपटाहट-चिंताएं, कष्ट और जीवन के प्रति उनका दर्शन समझना संभव है। लोकसाहित्य का आधार मनुष्य के जन्म से लेकर मृत्यु की समाप्ति तक के दर्शन से जुडा होने के कारण इसमें कहीं हर्षोल्लास के क्षण हैतो कहीं दु:ख के बादल मंडराते है। लोकसाहित्य का सबसे महत्वपूर्ण बिन्दु यह है कि इसके मूल में मनुष्य होने की का दर्द छिपा है।

स्त्री के संदर्भ में लोकसाहित्य की सबसे बडी विशेषता उनके मनुष्य होकर भी, मनुष्य के समान ना जीने के अवसर मिलने की पीड़ाऔर उसके अनुभव का व्यक्त होना है। और स्त्रियों में खासकर दलित और आदिवासी स्त्री के साथ तो यह पीड़ा बहुत ही मर्मांतक है। दलित आदिवासी स्त्री जिस ब्राह्मणवादी पुरूषसत्तात्मक समाज में जी रही है, वह उसे निम्न से भी निम्नतर श्रेणी में जीने को मजबूर करता है। लोकसाहित्य दलित आदिवासी स्त्री की अस्मिता, उसकी पहचान से जुड़े गीत, कहानियां उसके प्रति बरती जा रही अमानवीय क्रूरता, उपेक्षा, हिंसा और भेदभाव की पोल पट्टी खोलते हुए, उसके समर्थन में आकर समाज को चुनौती देता है। दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।

लोकसाहित्य जनमानस की धड़कन होते हुए भी समाजिक उपेक्षा के शिकार रहे है। इसका कारण है लोकसाहित्य का जनमानस से जुडा होना। लोकसाहित्य अपनी सहज अभिव्यक्तीय क्षमता और संपेक्षणीयता के कारणशास्त्रीय साहित्य को हमेशा टक्कर देता रहा है। एक तरफ शास्त्रीय साहित्य हमेशा सत्ता- वैभव- शक्ति सम्पन्न और वर्णव्यवस्था के हिमायती झंडाबरदारों द्वारा पोषित रहा है, दूसरी तरफ लोकसाहित्य आम जन द्वारा अपने द्वारा रोज रोज जिए जा रहे संघर्ष, अनुभव और स्वभाव की सहज सरल संपदा से परिपूर्ण रहा है। शास्त्रीय साहित्य और उसकी कलाएं एक नियम, अनुशासन, रीति से बंधी होती है जबकि लोकसाहित्य भावनाओं की मुक्त-स्वछंद और स्वतंत्र अभिव्यक्ति है। इसीलिए लोकसाहित्य मेंजहां एक ओर आम जनमानस का खुशी से नाचता-झूमता रूप नज़र आता है वहीं दूसरी ओर वह अपने रूदन को भी उतने ही सहज रूप से अभिव्यक्त करता है।

दलित साहित्य में अभी लोकसाहित्य पर काम होना बाकी है।पर सवाल यह है कि दलितों- आदिवासियों के बीच बिखरा पड़े लोकसाहित्य का संग्रह कैसे किया जाए? मेरा मानना है कि दलित- आदिवासी समाज की मनोदशा और उसकी स्थिति को समझने में लोकसाहित्य की बहुत बडी भूमिका हो सकती है, इसलिए इस दुश्कर लेकिन इस अति महत्वपूर्ण और रोमांचकारी काम को सामाजिक काम या सामाजिक उत्तरदायित्व समझकर करना पडेगा।

एक समय लोकगीतों का संकलन काग़ज की बरबादी माना जाता था परन्तु बाद में विख्यात साहित्यकार रामनरेश त्रिपाठी और देवेन्द्र सत्यार्थी आदि ने अपने हाथ में बीड़ा लिया और जगह-जगह घूम-घूम कर इन गीतों को संग्रह किया। आज भी अगर लोकमानस की नस पहचाननी है तो हमें लोकगीतों का अध्ययन करना चाहिए क्योंकि लोकगीत उनकी धड़कन में बसे है। जहाँ आदिवासी लोकगीतों की रचना उनकी संस्कृति और उसके रहन सहन, उनके जल जंगल जमीन से जुड़ाव के गीत है तो वहीं दलित समाज के गीत, समाज में अन्याय, पीड़ा अभाव और मजबूरी में बने रचे। आदिवासियों के जीवन में अशिक्षा, गरीबी उनके शरीर में खून की तरह घुल-मिल गए है । लोकगीत समाज में व्याप्त भेदभाव, शोषण, उत्पीड़न की बेबाक अभिव्यक्ति करते है। अधिकतर लोकगीत कन्या विवाह व कन्या विदाई से सम्बन्धित है, परन्तु कहीं-कहीं कन्या के जन्म पर भी गीत मिल जाते है। आश्चर्य की बात है कि जहां पुत्र जन्म या पैदा होने के अवसर पर गाए जाने वाले लोकगीतों की भरमार है, वहीं कन्या जन्म पर मुश्किल से एका-आध ही गीत मिलते है और वह भी कन्या पैदा ना करने के बारे में, या कन्या पैदा होने पर माँ दादी दादी पिता के मायूस होने व दुखी होने की स्थिति को ही अधिक दर्शाते है।आखिर हमारे समाज में हर कोई चाहे वह शिक्षित तबका हो या अशिक्षित, सबको पुत्र प्राप्ति की कामना ही क्यों रहती है? समाज में यह पितृसत्तात्मक मूल्य कूट कूट कर भरा गया है कि पुत्र ही वंश-वृद्धि और मोक्ष का द्वार है, मृत माता-पिता को कंधा देकर वहीं उन्हे स्वर्ग की सीढियां चढवाता है। इसलिए पुत्र होने पर स्त्री भाग्यशाली और पुत्री होने पर तरह-तरह के तानों से नवाजी जाती है। पुत्र पैदा होकर उसे जग हँसाई से बचाता है। दुनिया में उसका रूतबा बढ़ाता है। यही कारण है कि पुत्रों की कामना में वह व्रत रखती है मनौतियां मानती है। दूसरी ओर जब लड़की होती है तो शोक मनाया जाता है। समाज में लड़की पैदा होने को इस तरह बताया जाता है मानों लड़की होना माने 'कुछ नहीं होना' है। पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है। पुत्रियों वाला पिता, बाकी पुरुष समाज द्वारा या पूरे समाज दवारा हेय अथवा दया की देखा जाता है और अक्सर उपहास का कारण बनता है। जबकि यह एक वैज्ञानिक कारण है कि पुत्र और पुत्री होना ना तो औरत के हाथ में है ना ही पुरुष के हाथ में। फिर भी समाज में तरह तरह के अंधविश्वास और भ्रांतियां फैली हुई हैं, जिस में दोष सिर्फ और सिर्फ स्त्री के सिर ही मढा जाता है।

बन्जारा समाज में भी पुत्री जन्म के समय थाली और पुत्र जन्म के समय नगाड़ा बजाया जाता है।घऱ में बच्चा( पुत्र) पैदा होने के छठे दिन छठी मनाई जाती है। छठी माता की पूजा की जाती है तथा पुत्र के लिए तरह-तरह की दुआएं मांगी जाती है। छठी माता से अनुरोध किया जाता है कि आगे भी उसे पुत्र ही देना पुत्री नहीं देना।नीचे दिए गए बंजारा लोकगीत में एक स्त्री कहती है,“हे ! जन्म देने वाली देने वाली देवी! सन से सुतलीकातने तथा बुनने वाली पुरूष जाति को स्त्री के गर्भ से जन्म देना , सुई-धागे से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को हमारे कोख से जन्म न देना"

वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
सण ढेरो लेन वर आयेस
सुई दोरा लेन पर आयेस
सुओ सुतली लेन वर जायेस
लेपो लावण लेन पर जायेस
वे माता हासत-हासत आयेस
रोतो-रोतो पर जायेस
           (बंजारा जाति, समाज और संस्कृति यशवन्त जाधव, वाणी प्रकाशन पृष्ठ 25-26)

अब क्या कारण है कि इस देश की धरती पर एक स्त्री दूसरी स्त्री का जन्म ही देना नही चाहती ? क्या इसका कारण परिवारों में महिलाओं का पितृसत्ता के कलंक में अपने हाथ रंगना, स्त्री होने की पीड़ा से अपनी बेटी को बचाना है, या फिर दहेज प्रथा या महिलाओं की समाज में सबसे निम्नतम जगह होना है अथवा कुछ और?बन्जारा जाति में औरतों का जीवन जीवट भरा होता है। घर के अधिकांश काम जिनमें घर-बाहर के सारे कामकाज के साथ-साथ अपने खुद के कपड़े भी स्वयं सीना भी शामिल है, सब उसे ही करने पड़ते है। पुत्री के विवाह के समय उसका वर पक्ष से मूल्य लेना क्या एक बंजारा औरत को आहत नही करता होगा, जब उसके कौमार्य को, उसके स्वाभिमान को, कुछ रूपयों में पति रुपी मर्द के हाथ में बेच दिया जाता है? उसे दिनभर लोहे की बड़ी-2 भट्टियों में तपना पड़ता है। लोहे के हंसिये, तवे, चिमटे बेचने के लिए, बाजार में बेठकर सभ्य समाज की गन्दी निगाहों का शिकार होना पड़ता है, शायद उसकी यही व्यथा गीतों में फूट पड़ती है कि सूई से कपड़े सीने वाली स्त्री जाति को धरती पर जन्म मत देना।

पर बेटी होने की अपनी खुशियां भी है। कहीं कहीं लोकगीतों में बेटी होने का जश्न या खुशी भी दिखती है, पर वह क्षणिक ही होती है, जैसे इस लोकगीत में जिसमेंकबदायूं क्षेत्र की एक गर्भवती बहू भगवान से बेटी देने की इच्छा प्रकट करती है-

मैं तो पहले जनौगी धीयरी,
मेरी जौ कौख होय सुलच्छनी।।
जाकी गरजति आवैगी बराइति री,
पालिकी चढ़ि आवै साजन

परन्तु तुरन्त ही उसे यह अहसास हो जाता है कि बेटी तो ब्याह के अपने घर चली जायगी। घर और मेरी कोख दोनों खाली हो जायेगी। इसलिए मैं बेटी ना जनके बेटा जनूंगी जिससे मेरा घर भरा पूरा रहे। बहू घर में रूप भरती हुई घर में डोलेगी। महत्वपूर्ण और रोचक तथ्य यह है कि लोक साहित्य में जहाँ कन्याजन्म की चर्चा बहुत ही कम है जबकि पुत्र जन्म के ऊपर हजारों गीत हैं, दूसरी ओर कन्या के विवाह को लेकर अनगिनत गीत मिलते है। एक लोकगीत में कन्या अपने पिता से सवाल पूछती है,“हे ! पिताकौन ग्रहण रात में लगता है? कौन दिन में? और कौन ग्रहण बेवक्त लगता है? और कब छूटता है?”पिता अपनी पुत्री के सवालों का जबाब देता हुआ कहता है,“हे बेटी! चन्द्र ग्रहण रात में लगता है और सूर्य ग्रहण दिन में। कन्या ग्रहण का कोई ठिकाना नहीं कि कब लगे और कब छूटे?”

आदिवासी समाज में भी जन्मगीत खूब मिलते है परन्तु आदिवासी समाज में लड़की होना उतनी शर्म की बात नहीं जितना की अन्य समाज में। इसका कारण शायद यही है कि आदिवासी समाज में स्त्री-पुरुषों के संबंधों में कुछ तो समानता रही ही है। एक मुण्डा लोकगीत जिसमें एक स्त्री अपनी पुत्री की जन्मk संबंधी जिज्ञासा शांत करते हुए कहती है कि-जब लड़का पैदा होता है तब सूर्य उगा, जब चांद उगा तू लड़की पैदा हुई। जब लड़का पैदा हुआ तब गोहाल उजड़ गया और जब लड़की पैदा हुई तब गोहाल भर गया।

 

दलित आदिवासी स्त्री द्वारा रचे गए गीत-प्रगीत, किस्से कहानियां, उनके शारीरिक शोषण से लेकर मानसिक और शारीरिक प्रताड़ना की शिकायत करते है। उनके प्रति की जा रही घरेलू और सामाजिक हिंसा की मार्मिक दास्तान सुनाते है।


दलित स्त्रीजाति के बाण से किस प्रकार घायल होती है, वह अपने दलित होने की सजा हमेशा पाती है। एक तरफ उसे दलित समझकर उसको उपभोग की वस्तु समझा जाता है तो दूसरी और उसको सबसे ज्यादा सामाजिक हिंसा का शिकार होना पडता है। सवर्ण समाज के स्त्री पुरुष दोनों ही उसको तरह तरह से उत्पीड़ित करते है। वह जीवन के प्रत्येक स्तर पर जातीय भेदभाव, धार्मिक पाखंड तथा अंधविश्वास झेलती है।दलित औरतों का किस प्रकार यौन शोषण किया जाता है, उनकी गरीबी का, उनके देह का इस्तेमाल किस कदर किया जाता है,इसका एक मैथिली गीत 'भंडौवा' में छूआछूत मानने वाले एक ब्राह्मण के इसी स्वरूप का पर्दाफाश किया है। जिस ब्राह्मण की बात बात किसी के स्पर्श मात्र से ही जात चली जाती है, उसी ब्राह्मण का दलित स्त्री के साथ जबर्दस्ती शारीरिक संबंध बनाने से, उनका चुंबन लेने से जाति नही जाती है। दलित स्त्रियां ऐसे ढोंगी ब्राह्मण पर ताने कसते हुए और उसका मजाक बनाते हुए कहती है कि-  

अरे हो बुडबक बमना, अरे अरे हो बुडबक बमना
चुम्मा लेते में जात नहीं जाएं रे।
सुपति- मडनियां लाए डोमिनियां, मांगे प्यास से पनियां
कुआं के पानी ना पाए बेचारी, दौड़ल कमला के किनरियां,
सोही डोमनियां जब बनली नटिनियां, आंखी मारे पिपनियां?
ते करे खातिर दौड़ले बौड़हवा, छोड़के घर में बमनियां।
जोलहा, धुनिया, तेलनियां के पीए न छुअल पनियां
नटिनी के जोबना के गंगा जमुनुवां में डुबकी लगा के नहनियां।
दिन भर पूजा पर आसन लगा के पोथी पुरान बचनियां
रात के ततमा टोली के गलियन में जोत खीजी पतरा गननियां
भकुआ बमना चुम्मा लेवे में जात नहीरे जाए।

 -(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना- विश्वमित्र उपाध्यय पृ.स.18 प्रकाशन विभाग)
ऐसे ही एक गरीब दलित महिला जब गांव की सभी गैर दलित महिलाओं को त्यौहार पर सुंदर सुंदर कपडे पहने देखती है तो अपनी सहेली से कहती है कि- कार्तिक माह में सब महिलाएं अच्छेवस्त्र पहनकर स्नान करने जायेगी। परन्तु मैं तो फटा पुराना वस्त्र पहनकर ही जाऊंगी क्योंकि मेरे पास अच्छे वस्त्र नहीं हैं-
कातिक हे सखि पुन्य महीना, सखि
सब कोई पहिने पाट पंय्बर
हम सखि गुदरी पुरान है।।
पूस हे सखि ओस पड़ि गेल,
भीजि गेल लामी लामी केश है।
जाड़ा छेदे, तन सुई सन छन छन
थर थर कांपई करेज हे।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना पृ.स.16, प्रकाशन विभाग)

अकाल, भूख, गरीबी, अभाव की मार सबसे ज्यादा गरीबदलित तबके की स्त्री को ही झेलनी पड़ती है। दलितों के पास ना तो अपनी जमीन होती है और ना ही खेत-खलिहान होते है। सौ मेंनब्बे प्रतिशत खेतिहर मजदूर- किसान, असंगठित क्षेत्रों में काम कर रहे मजदूर दलित समाज के ही होते है। इन दलित आदिवासी भारतीय मजदूरों की हालत किसी से छिपी नही है। वे बेहद गंदे और छोटे घरों में रहते है. जहां बिजली, पानी, हवा, स्कूल, अस्पताल आदि किसी भी तरह की व्यवस्था नही होती। पुरुष कामगारों से भी अधिक स्त्री मजदूर कामगारों की हालत खराब होती है। ना उन्हे मजदूरी ठीक से मिलती है और ना ही एक कामगार के बराबरी का रुतबा और ना ही सम्मान । ऐसे में वह घर से लेकर बाहर तक शोषण अन्याय उत्पीड़न की चक्की मे रात-दिन पिसती है। ऐसी ही परिस्थितियां झेल रही एक श्रमिक महिला समाज से सवाल करती है कि वह कड़ी धूप में जब मिट्टी तोड़ रही है, उसके पास इतनी मेहनत करने के बाद भी ना पहनने को पूरे कपड़े हैं और ना ही भूख मिटाने का खाना. जब वह पसीने और मिट्टी से तरबतर है तब मालिक और अमीर लोग अपने अपने घरों में गट्ट-गट्ट खाना खाकर आराम से सो रहे है। 

अंग पर अंगिया नही, भूखी प्यासी मैं
गिट्टी तोड़ती हूँ इस भरे घास में
पत्थर की किरच छक की आवाज़ से
मेरे शरीर पर टकराती है,
मेरा जीवन हराम है।
अंग पर पसीना छक छक करता है
नयनों से आंसुओं का परनाला बहता है।
ओ मां मेरे शरीर पर मिट्टी खप से चुभ जाती है।
रक्त की धार बह उठती हैं
पैसे वाले गट्ट गट्ट खाना खाकर
घर पर आराम करते है।
(लोकगीतों में क्रान्तिकारी चेतना वही पृष्ठ 161)
 
सर्दी गर्मी बरसात चाहे कोई मौसम हो हरेक मौसम में गरीब दलित आदिवासी लोगों का जीवन दूभर होता है। सर्दी की विभीषिका को झेलते हुए एक मुंडा आदिवासी स्त्री कहती है-
हाय जाड़ा तुम चले जाओ।
हाय ठंड तुम उठ जाओ.
हे जाड़ा तुम उन व्यापारियों के पास चले जाओ
हे ठंड तुम उन सौदागरों के पास चले जाओ
जिनके पास मोटे कपड़े है
( बांसुरी बज रही है- मुण्डा लोकगीत- पृष्ठ 136, श्री जगदीश त्रिगुणायत)
 
अधिकांश लोकगीतों में सास, ननद, पति, ससुर, देवर के नाकारात्मक चित्र है। दरअसल सास ससुर, देवर नंद और पति यह सब लोग भारतीय परिवारों में पितृसत्तात्म मूल्यों के प्रहरी बन असहाय स्त्री पर जुल्म करते है। यह जातिवादी भारतीय मानसिकता ही है कि ताकतवर कमजोर पर अत्याचार करने में अपनी शेखी समझता है। चूंकि बहु को विवाह करके लाया गया है, उसे अच्छी तरह तोल-मोल और देख-दाख के परिवार के लिए लाया गया है इसलिए उस से रात-दिन काम करवाकर, उसके साथ खरीदी गई दासी की तरह बर्ताव करने का अधिकार अनचाहे ही पूरे परिवार को मिल जाता है ।ज्यादातर लोकगीतों में भाई अपनी बहन के लिए, बेटा अपनी माँ के लिए तो कहीं-कहीं बेहद संवेदनशील दिखाई देता है, पर वह अपनी पत्नी के लिए वैसा स्नेह, सुरक्षा की भावना, संवेदनशीलता नही जुटा पाता है। जैसे ही उसकी पत्नी बच्चे के रुप में बेटा नही जन्मती, पत्नी के रुप में उसके माता पिता की सेवा नही करती, या घर के काम काज को परिवार के मानदण्डो पर पूरा नही करती, वैसे ही पति उसका किसी बहाने परित्याग, या फिर दूर नौकरी के बहाने से उसे छोड कर चला जाता है। बहुत सारे लोकगीतों में पति के खिलाफ एक पत्नी के दुख दर्द और वेदना ही प्रकट हुई दिखती है।एक निमाड़ी गीत में पति को पंखा करते समय पत्नी को नींद आ गई तो उसे उसका पति उसे बुरी तरह से पीट देता है।

धणियेर राजा सोया सुख सेज
रणुबाई रीझ रणों जी.
डोलत जे डोलत आई गई झपकी
हाथ का रीझणों, भुई गिरयो जी
धणियेर राजा की खुलि गई नींद,
तड़ा  तड़ मारयो  ताजणी ।
(पृष्ठ संख्या-110, लोकगीतों में वेदना और विद्रोह- संपादक माता प्रसाद, सम्यक प्रकाशन)

दलित समाज में अपना हास्य-बोध, सौन्दर्य-बोध और प्रेम-बोध है। जहां गैर दलित लोकगीतों में पति के अत्याचार वाला रूप प्रमुख है पर दलित स्त्रियों द्वारा गाए जाने वाले लोकगीतों में पति-पत्नी के हास्य विनोद, प्रेम-स्नेह, लड़ाई- झगड़े के चित्र भी खूब दिखाई देते है। दलित समाज में गाए जाने वाले गीतों में दहेज-प्रताड़ना के गीत कम है, क्योंकि इस समाज के पास देने के लिए दहेज है ही नही।दलित आदिवासी परिवारों में अभी भी स्त्री-पुरुष समानता के कुछेक तत्व बचे हुए है। एक लोकगीत में पति पत्नी के बीच आपस का प्यार इस प्रकार प्रकट हुआ है-

मैं बड़ी दूर से आया, मेरो गोरी.. मुन्डसे बीच नगीना
मैंने ऐसा पंखा डोला, जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसी करके राखियों, मेरा राजा, जैसे गूंठी बीच नगीना
मैं बडी दूर से आया, मेरो गोरी, सुरमें बीच सपीना
मैंने ऐसा पंखा डोला जल्दी मरा पसीना
मुझे ऐसा करके रखियों, मेरा राजा, जैसा किंगूठी बीच नगीना
( पृष्ठ संख्या 146, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

पति के बाहर कमाने के लिए जाने पर पत्नी का उसके साथ जाने की बात पर अड़ना, उससे लडाई झगडा करने वाली भावनाओं पर बहुत सारे लोकगीत है। इन लोकगीतों में पति के बाहर जाने पर पत्नी का अकेले पड़ जाने का भय, तथा ससुराल के अत्याचार झेलने का डर स्वाभाविक दिखता है। अक्सर होता भी यही था कि जिसमें पति बाहर नौकरी करने चला जाता है फिर अपनी ब्याहता औरत को सुध नही लेता था। आदमी के लिए बाहर की दुनिया है तो औरत के लिए घर की घुटनभरी दुनिया। ऐसे ही एक लोकगीत में कमाने के लिए परदेश जा रहे पति के किसी भी शर्त पर जाने के लिए एक ब्याहता स्त्री कहती है-

'अपने बलम की टोपी बनूंगी, जुल्फो में रहूंगी रे
मेरे राजा फूल गुलाब के, गुलकन्द बनूंगी रे
मैं रो रो अखियों लाल, बलम तेरे साथ चलूंगी रे
अपने बलम का सुरमा बनूंगी रे, डोरों में रहूंगी रे
मैं रो रो अंखियों लाल, बलम तेरे संग चलूंगी रे'
( पृष्ठ संख्या 149, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
पति के परदेश जाने पर, औरत अकेली हो जाती है ऐसे में उसके अकेले पड़ जाने पर अक्सर परिवार के ही दूसरे लोग चाहे वह पड़ोसी हो या रिश्तेदार, या फिर अपने ही घर के सगे-संबंधी, वे इन अकेली पड़ गई औरतों का जबर्दस्ती फायदा उठाने में कोई कोर कसर नही छोड़ते। छोटे भाई के कमाई के लिए परदेस जाने पर, बडा भाई यानि जेठ कैसे छोटे भाई की बीबी को छेडता है इसका बड़ा ही मार्मिक वर्णन एक लोकगीत में मिलता है। जेठ की शिकायत करने पर परिवार का कोई सदस्य उसको उसकी इस हरकत के लिए नही रोकता, अपितु बहु को ही दोष देने लगता है। यहां तक कि बहु को अपनी रक्षा करने के लिए जेठ पर तेल छिड़क-छिड़क कर मरने मारने की भी धमकी देने का असर नही होता -

पकड़ आम की डाली, धनि क्यूं खड़ी
का तुझै लगा है बैराग, ता का मैथिली हारी
चला जा रे मूरख गंवार, तुझे मेरी का पड़ी
मेरे राजा गए परदेश, अन्देसे में मैं खड़ी
गंगा रे जमन के बीच, जउड़े दो मक्खियां
अरे देख राजा तेरी बाट, दुख मेरी अंखियां।
मैं गम गम कोठे चढ़ गई री, मेरे हाथ में घड़ी।
पीछे से जेठा चढ़ गए री, मेरी बईया पकड़ी।
घरों में बैठी सासल, मैंने उनसे कहीं
मना लो अपने पेटा ने,मेरी बईया पकड़ी
म्हारा क्या इसमें दोस, तू ता सुथरी घणी।
आजा रे मेरे जेठा, जोड़ी अजब मिली।
छिड़कूंगी मटिया का तेल, बोतल आले में धरी।
( पृष्ठ संख्या 151, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

 

पुत्रों को ज्यादा महत्व देने के संदर्भ में एक अहम बात और है, वह यह कि पुत्र पैदा करना पुरुष के लिए उसकी मर्दानगी की कसौटी है. जिसके पुत्र नही पैदा होते और पुत्रियां ही पैदा होती है वह पिता चाहे अनचाहे मर्दानगी के अभाव के सामाजिक दबाब में जीता है।

 
मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन के लेखक डॉ. देवी सिंह ने दलित समाज में प्रचलित ऐसे लोकगीतों का संकलन किया है जिसमें दलित समाज की स्त्रियां अपने परिवार में अपनी इच्छाओं आकांक्षाओं को खुलकर बताती है। उनके इच्छाओं आंकाक्षाओं पर परिवार के द्वारा रोक ना होकर अपितु इन इच्छाओं को पूरा करने में सहयोग ही दिखाई देता है। निश्चय ही दलित समाज में दलित स्त्री की आजादी के लिए बंधन उतने कठोर नही रहे है जितने कि सवर्ण समाज में रहे है। लोकगीतों में कुछ ऐसे भी गीत है जहां कुंवारी लड़किया अपने होने वाले पति से मिलना चाहती है या फिर उन्हें किसी से प्रेम हो जाता है तो वे उसके साथ जाना चाहती है। वह किसी से छुपकर या छुपाकर नहीं बल्कि परिवार के अन्य सदस्यों को बताकर मिलने जाना चाहती है।

कमला लिकड बाग ते, बाग में कौन बटेऊ सै
अम्मा बैल्ले में दूध सेल्ला, बाग में तेरा जमाई सै
मेरी अम्मा रान्धे दाल, भावज मेरी मान्डे पोवे सै
मेरी लाई कई कसार, सखी मेरी तेल दिखावै सै
मणे पहरी रेशमी सूट, के झिल मिल होरी सै
मणे ओड़ी काल बेल, के झिलमिल होरी सै
मणे दिया सीट पे पैर के गाड़ी चालू हो री सै
छोरूं ने मारी किलकारी , है रै र र होरी सै
( पृष्ठ संख्या 140, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
इसी तरह एक और लोकगीत में विवाह से पूर्व लड़की अपनी दादा-चाचा-ताऊ से अपने होने वाले दूल्हे से मिलने के लिए जाना चाहती है तो वह अपने चाचा ताऊ दादा से अरज करती है कि मेरे होने वाले पति बाग में आ गये है मैं उनसे कैसे मिलने जाऊ ? तब चाचा ताऊ और दादा लड़की को उसके भावी दूल्हे से मिलने के लिए मालन और धोबिन बनकर जाने के लिए कहते है -
लाडो बेटी अरज करे दादा से, मैं किस विद देखन जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।
हाथ छबडियां फूलन की है , लाडो मालनियां बनके जाऊ
रंगीले आ गये बागन मैं।।
बोल गये बतलाए गये बागन मैं,
मेरी हलद चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये बागन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये बागन मैं
लाड़ो अरज करै बाबा से, मैं किस विद देखन जाऊं
रंगीले आ गए बागन में
जल का लोटा हाथन में लाड़ो धोबनियां बन के जाओ।
छबीले आ गये तालन में
बोल गये बतलाय गये तालन में
मेरी सीरी चढ़ी लाडों कू, नजर लगाए गये तालन मैं
मेरी केस खिली लाडो को, नजर लगाय गये तालन मैं
( पृष्ठ संख्या 143, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)
 
ऐसी गीतों की रचयिता स्वयं औरतें ही रही है और वे इन्ही गानों के माध्यन से अपने मन की इच्छाओं को बताती रही है। दलित-आदिवासी स्त्रियों की एक बडी खूबी है कि वे अपने जीवन को पूरी जीवटता से जीती है। वे किसी भी परिस्थितियों में हार नही मानती है। झलकारी बाई, फूलो झानो,सिनगी दई, ऊदादेवी पासी, महावीरी देवी से लेकर फूलन देवी तक दलित आदिवासी स्त्रियां असख्य की संख्या में हमारे सामने शूरवीरता की मशाल लेकर खडी है। यह स्त्रियां जितनी जाबांज, जितनी मेहनती होती है उतनी ही हास परिहास में भी माहिर होती है। अगर किसी को देखना हो तो इनके हास-परिहास व इनके व्यंग्य की मारक क्षमता लड़के के विवाह में बारात जाने के बाद देखी जा सकती है जिसमें बारात में ना जाकर घर पर रुकी औरतें मिलकर विवाह की पैरोडी बनाकर नाटक की तरह खेलती है। जिनमें उनकी हंसी के पात्र पंडित-जमींदार- शोहदे से लेकर ऐसे लोग बनते है जो उनको किसी तरह तंग या बुरी निगाह से देखते है। समाज में फैली कुरीतियां भी इनके व्यंग्य की धार से लहुलुहान हो जाती है।

ऐसे ही एक लोकगीत में एक पत्नी अपने पति के साथहास्य-विनोद करती हुई और पति को जलाने, चिढ़ाने के लिए अपने देवर का सहारा लेती हुई कहती है -
मेरे राजा ने बाग लगाय दिया रै,
छोटे देवर ने नीमड़ी लगाई रै।
मन रसिया, रसिया रे, गेटूरा रै।।
राजा के बागों में ना जाऊं रै।
छोटे देवर की नीमड़ी की नीमड़ी में सोऊ जाय रै।
( पृष्ठ संख्या 145, मेरठ जनपद की परिगणित जातियों के लोकसाहित्य का अध्ययन- लेखक डॉ. देवी सिंह)

इसमें कोई संदेह नही कि अगर दलित-आदिवासी संस्कृति की खोज करनी है, दलित-आदिवासी समाज को समझना है तो हमें लोकसाहित्य को खंगालना पड़ेगा। क्योंकि लोकसाहित्य मनुष्य के आपसी संबंधो से लेकर उनके सामाजिक व्यवहार, उनके प्रति बाकी समाज का रवैया, उनकी परंम्पराएं, उनके हर्ष-विषाद के क्षण को खोजने की कुंजी है। सबसे पहले किसी समाज को जानने के लिए सबसे प्राथमिक तथ्य उनकी अपनी वाचिक और मौखिक परंपरा ही होती है। खासकर ऐसे समाज की मनोदशा को जनाने के लिए, जिस पर सदियों से जुल्म अत्याचार, भेदभाव, शोषण होता रहा हो. जो मात्र दलित समाज में जन्म लेने के कारण ही प्रत्येक मानवीय अधिकार से दूर कर दिए गए। जिनकी हालत जानवरों से भी बदतर कर दी गई हो। जिनके शरीर के साथ दिमाग को भी गुलाम बना लेने का पूरा षड़यंत्र रचा जाता रहा हो। ऐसे समाज को जानने के लिए उस समाज की लोकसाहित्य की परम्परा को पढा जाना, उसे लिखा जाना और उसे स्थापित किया जाना बेहद जरुरी है।

(अनिता भारती सुप्रसिद्ध दलित स्त्रीवादी साहित्यकार और सामाजिक कार्यकर्ता है।)

 
 

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