महानता के चिन्ह

Published on: 01-08-2016
 
Graphic Courtesy: The Hindu

महान सभ्यताएं महान लोगो से बनती हैं। भारत शुरू से ही महान लोगो की भूमि रहा है। यहां महामानव पग-पग पर मिलते हैं, लेकिन साधारण आदमी खोजना बड़ा मुश्किल होता है। जहां के लोग इतने महान होंगे, वह सभ्यता भला महानतम कैसे नहीं होगी! सुबह उठते ही मन एक दिव्य गर्व की अनुभूति से भर जाता है। इस पावन भूमि के चप्पे-चप्पे पर हमारे पूर्वजों की महानता के अनगिनत चिन्ह बिखरे पड़े हैं। उन्हे निहारते रहो तो एक दिन क्या, पूरी जिंदगी निकल जाये। लेकिन रोटी-दाल के चक्कर में पड़े लोगो के दस झमेले और होते हैं। दिल्ली में एक काम अंटका पड़ा था। कई दिनों से प्लानिंग कर रहा था। सोचा था, इस बार हवाई यात्रा कर आउंगा। लेकिन जब ऑनलाइन बुकिंग करने बैठा तो पता चला किराया रातो-रात में दोगुना हो गया है। बड़ा गुस्सा आया, उड़ने का कितना भी शौक हो, लेकिन कोई पूरी तनख्वाह हवाई यात्रा में कैसे उड़ा सकता है! सुबह-सुबह मूड खराब हो गया। फिर सोचा चलो कोई बात नहीं मेरी किस्मत में रेलगाड़ी है तो यही सही, लेकिन मेरे पुरखे कभी पुष्पक विमान की सैर किया करते होंगे और वो भी उस जमाने में जब दुनिया के बाकी हिस्सो में कपड़े पहनने तक का रिवाज नहीं था। महान अतीत वाले समाज में पैदा होने का यही लाभ है, वर्तमान में कितना भी कष्ट हो, गौरवशाली अतीत उदास नहीं होने देता। टीवी ऑन किया तो बिगड़ा मूड और अच्छा हो गया। डॉक्टरों के किसी कार्यक्रम में भाषण देते हुए प्रधानमंत्री जी ने बताया कि आज पूरी दुनिया जिस स्टेम सेल थेरेपी की बात कर रही है, वह हमारे यहां द्वापर युग में भी मौजूद थी और कर्ण का जन्म इसी तकनीक से हुआ था। प्रधानमंत्री जी ने ये भी बताया कि प्लास्टिक सर्जरी भी हमारे देश में आदिकाल से थी और इसी के प्रयोग से गणेशजी के धड़ में हाथी का सिर जोड़ा गया था।
 

सचमुच अद्भुत है, हमारा देश। दुनिया में होनेवाली हर नई चीज़ के बीज हमारे यहां पहले से मौजूद हैं। स्टेम सेल से लेकर प्लास्टिक सर्जरी तक ऐसी तरह तकनीक पर ऐतिहासिक और नैतिक तौर पर  हमारा ही अधिकार है। इस हिसाब से देखें तो हमें कोई नया अनुसंधान करने की ज़रूरत ही नहीं है। यह काम बाकी दुनिया पर छोड़ देना चाहिए।


सचमुच अद्भुत है, हमारा देश। दुनिया में होनेवाली हर नई चीज़ के बीज हमारे यहां पहले से मौजूद हैं। स्टेम सेल से लेकर प्लास्टिक सर्जरी तक ऐसी तरह तकनीक पर ऐतिहासिक और नैतिक तौर पर  हमारा ही अधिकार है। इस हिसाब से देखें तो हमें कोई नया अनुसंधान करने की ज़रूरत ही नहीं है। यह काम बाकी दुनिया पर छोड़ देना चाहिए। दुनिया जो भी करेगी वह एक तरह से हमारे काम को ही आगे बढ़ाएगी। हमें तो ऐसे काम करने चाहिए जो अनादि काल से लेकर अब तक हमारे यहां हुए ही नहीं। ऐसी समस्याएं सुलझानी चाहिए जो त्रेता और द्वापर से लेकर अब तक नहीं सुलझ पाई हैं। ऐसी एक समस्या है--  फायर फाइटिंग यानी अग्निशमन। देशभर में हर साल उपहार सिनेमा हॉल जैसे दो-चार कांड ज़रूर होते हैं। ना जाने कितने मासूम लोग मरते हैं, लेकिन आग तभी बुझती है, जब जान-माल का भारी नुकसान हो चुका होता है। सच बात ये है कि अग्निशमन की कोई कारगर टेक्नोलॉजी इस भारत भूमि पर कभी थी ही नहीं। अगर होती तो त्रिलोक अधिपति रावण की आंखो के सामने उसकी सोने की लंका धूं-धूं करके ना जल गई होती। पांडवो का लाक्षागृह भी वैसे ही जला था। हालांकि उसमें षडयंत्र था। ये माना जा सकता है कि अगर फायर फाइटिंग इक्विपमेंट रहे भी होंगे, तो दुर्योधन ने जानबूझकर उन्हे लाक्षागृह में नहीं लगवाये होंगे। लेकिन फिल्म बाहुबली देखते हुए भी इस बात एहसास हुआ अग्निशमन का कोई ठोस इंतज़ाम कभी भारत में नहीं था। राजा भल्लाल देव के महल में बाहुबली ने आग लगा दी, लेकिन ना तो फायर ब्रिगेड आई और ना ही अग्निशमन दल के कर्मचारी दिखे। आग कब और कैसे बुझी ये कोई नहीं जानता। आग बुझाने के साथ प्यास बुझाना भी भारत की एक बड़ी समस्या रही है। गोपियां जिस तरह सिर पर मटकी उठाये पानी भरने जाती थीं, उसी तरह गांव की औरते आज भी जाती हैं। शायद उन्हे गोपियों के मुकाबले कहीं ज्यादा चलना पड़ता है। गोपियों का पनघट तक जाना एक श्रृंगारिक दृश्य उत्पन करता था, गांव की औरतो का पानी भरना करुण रस का संचार करता है। राह चलते कान्हा तक रोमैंटिक होने के बदले द्रवित हो जाते हैं, क्या पता मीलो चलने के बाद भी इन बेचारियों को पानी मिले या ना मिले, ऐसे में मटकी तोड़ना तो महापाप है। पौराणिक कथा में दयमंती नल का इंतज़ार करती थी। दयमंती आज भी नल का इंतज़ार करती है, राजा नल नहीं, म्यूनिसपैलिटी के नल का। लेकिन नल कभी नहीं आता। पानी की समस्या अब भी वहीं की वहीं है, जैसी प्राचीन भारत में थी। दुनिया भर में मामा बिरादरी को बदनाम करने वाले कंस ने शिशु वध की जो परंपरा डाली थी, वह आज भी जारी है। फर्क सिर्फ इतना आया है कि कंस देवकी के पुत्रों की हत्या करता था और आज के कंस पुत्रियों की हत्या करते हैं, वह भी गर्भ में। हत्या की परंपरा तनिक भी नहीं बदली। न्याय व्यवस्था की रफ्तार आज भी वैसी ही है, जैसी दो युग पहले थी। पत्थर बनी अहिल्या को बरसो तक मर्यादा पुरुषोत्तम की प्रतीक्षा करनी पड़ी थी। अंबा को न्याय प्राप्त करने के लिए अगला जन्म लेना पड़ा था। आज भी इंसाफ पाने में बरसो लगते हैं, दादा का मुकदमा पोता लड़ता है, लेकिन फैसला नहीं हो पाता। ऐसी कुछ समस्याओं को हल मोदीजी करवा दें तो ये युग पूरी तरह बदल जाएगा। जहां तक भारत भूमि पर यत्र-तत्र-सर्वत्र बिखरी महानता की निशानियों का प्रश्न है, तो पूरा देश उन्हे हमेशा की तरह नमन करता ही रहेगा।