भक्तों दा जवाब नहीं! गांधीजी का ‘विलोपन’: तीन ‘आसान’ किश्तों में !

Written by Subhash Gatade | Published on: January 27, 2017
..जो शख्स तुम से पहले यहाँ तख़्त नशीन था.... 
उसको भी खुदा होने पे इतना ही यकीन था

- हबीब जालिब 
 
Modi Bhakt 

भक्तगणों का - अर्थात वही बिरादरी जो ढ़ाई साल से लगातार सुर्खियों में रहती आयी है -  जवाब नहीं !
 
अपने आराध्य को इस कदर नवाज़ते रहते हैं गोया आनेवाली पीढ़ियों को लगने लगे कि ऐसा शख्स कभी हुआ न हो। वैसे टेक्नोलोजी की तरक्की ने उनके लिए यह बेहद आसान भी हो गया है कि वह फोटोशॉप के सहारे दिखाए कि कथित 56 इंची सीने के बलबूते वह कुछ भी कर सकते हैं।

मिसाल के तौर पर वह बाढ़ के हवाई सर्वेक्षण के लिए निकलें और धुआंधार बरसते पानी में उनकी आंखों के सामने समूचा शहर नमूदार हो जाए। यह अलग बात है कि उनकी इस कवायद में कई बार उनके इस हीरो की हालत हिन्दुओं के एक पवित्रा कहे जाने वाले एक ग्रंथ में नमूदार होते नारद जैसी हो बना दी जाती है, जिसे इस बात का गुमान ही न हो कि उसने कैसा रूप धारण किया है और उनका यह आराध्य दुनिया भर में अपने आप को मज़ाक का निशाना बना दे। 
 
हम याद कर सकते हैं अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति ओबामा की अगवानी का प्रसंग जब दिन में तीन तीन बार ड्रेस बदलने या अपना खुद का नाम अंकित किया दस लाख या करोड़ रूपए का सूट पहनने की उनके आराध्य की कवायद विश्व मीडिया में सूर्खियांे में रही, उसका जबरदस्त मज़ाक उड़ा और इसी दौरान मीडिया ने इस तथ्य को उजागर किया था कि इसके पहले ऐसी आत्ममुग्धता भरी हरकत मिस्त्र के अपदस्थ तानाशाह होसनी मुबारक ने की थी।
 
अब चूंकि आलम यह है कि फिलवक्त़ मुल्क में भक्तों एवं उनके आंकाओं की ही तूती बोलती है लिहाजा वे कुछ भी करने के लिए आज़ाद है। कमसे कम आने वाले ढाई साल तक भारतीय लोकतंत्रा को ऐसे कई नज़ारे देखने को मिलेंगे, और वह सभी लोग, जमातें जो संविधान के बुनियादी मूल्यों की हिफाजत की बात करते हैं उन्हें ऐसी विपरीत परिस्थितियों से बार बार रूबरू होना पड़ेगा और उन्हें लोहिया की उस उक्ति को विस्मृति से बचाना होगा जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘जिन्दा कौमें पांच साल तक इन्तज़ार नहीं करतीं।’
 
बहरहाल, कभी कभी भक्तगण भी अति कर देते हैं जैसा कि पिछले दिनों देखने को मिला, जब किसी अलसुबह लोगों ने खादी ग्रामोद्योग आयोग के कैलेण्डर पर गांधी के बजाय वजीरे आज़म नरेन्द्र मोदी की तस्वीर देखी। पहले तो लोगों का यकीन भी नहीं हुआ कि उनके देखने में कुछ गलती हो रही हो, मगर जब बारीकी से देखा तब लोगों को पक्की तौर पर यकीन हुआ महज यह दृष्टिभ्रम नहीं है। अपने फकीरी या सन्तनुमा अन्दाज़ में बैठ कर सूत कातते गांधी को मोदी की तस्वीर ने प्रतिस्थापित किया है। सियासी दलों, गणमान्यों की तरफ से तीखी प्रतिक्रिया आयीं मगर इसके पहले मोदी द्वारा गांधी के इस अलग ढंग से प्रतिस्थापन को लेकर सोशल मीडिया में इसे लेकर कई फोटोशॉप्ड इमेजेस शेअर की गयीं जिसमें भारतीय इतिहास के इस ‘पुनर्लेखन’ का जम कर मज़ाक उड़ा। भारत के इतिहास की कई अविस्मरणीय घटनाओं में शामिल शख्सियतों के स्थान पर मोदी की तस्वीर चस्पां करके लोगों ने इस प्रयास की धज्जियां उड़ा दीं, फिर चाहें दांडी मार्च की तस्वीर में दिखाए जो रहे ‘मोहनदास करमचंद मोदी’ हों या आज़ादी के वक्त भारत की अवाम को संबोधित करते नेहरू के स्थान पर नज़र आते मोदी हो, किसी शरारती व्यक्ति ने खादी ग्रामोद्योग के बाद अब किंगफिशर कैलेण्डर पर भी जनाब मोदी की तस्वीर चस्पां कर दीं। (https://scroll.in/article/826756/modi-fying-history-social-media-photoshops-modi-into-the-freedom-struggle-and-kingfisher-calendar) तस्वीर की कई अंगों से विवेचना भी हुई जिसमें एक पहलू यह था कि बारह पन्ने के समूचे कैलेण्डर में महिलाएं लगभग अनुपस्थित हैं या अगर नज़र भी आ रही हैं तो बेहद धुंधली नज़र आ रही हैं।
 
भाजपा की असमावेशी राजनीति की मुखालिफत करनेवाली तमाम पार्टियों ने, समूहों ने इस भोंडे प्रयास की जम कर आलोचना की, कई जगहों पर प्रदर्शन हुए। अब कायदन होना यही चाहिए था कि कैलेण्डर को वापस लिया जाता और जनता से माफी मांगी जाती कि जो कुछ हुआ वह खेदजनक था और जिसके लिए उपर से अनुमति नहीं ली गयी थी । मगर हुआ बिल्कुल उल्टा। भाजपा की तरफ से आधिकारिक तौर पर यही कहा गया कि गांधी उनके लिए आदर्श हैं और उन्हें प्रतिस्थापित करने का उनका कोई इरादा नहीं है। और इस बयान के विपरीत पूरी कवायद यही की गयी कि मामले को औचित्य प्रदान किया जाए। कई मंुहों से कई बात की जाए। 
 
खादी आयोग के हवाले से बताया गया कि किस तरह मोदी खादी के लिए बड़ा ब्राण्ड बन गए हैं, वह किस तरह यूथ के आइकन हैं, गुजरात भाजपा की तरफ से कहा गया कि किस तरह मुख्यमंत्राी पद के दिनों में जनाब मोदी ने खादी को बढ़ावा दिया था आदि। हरियाणा भाजपा नेता और कैबिनेट मंत्राी अनिल विज इस मामले में सबसे आगे निकले। अंबाला में एक कार्यक्रम में उन्होंने कहा कि ‘खादी गांधी के नाम पेटेण्ट नहीं हुई है। खादी उत्पादों के साथ गांधी का नाम जुड़ने से ही उसकी बिक्री में गिरावट आयी। वही हाल रूपये का भी हुआ है। जिस दिन गांधी रूपये की तस्वीर पर अवतरित हुए तभी से उसका अवमूल्यन शुरू हुआ है। धीरे धीरे रूपए के नोट से भी उनको हटा दिया जाएगा। मोदी गांधी से बड़ा ब्राण्ड बन चुके हैं।’ 
 
उधर ब्राण्ड मोदी को लेकर राहुल गांधी का संक्षिप्त बयान आया:  ‘हमें नहीं भूलना चाहिए कि हिटलर और मुसोलिनी भी बड़े ब्राण्ड बने थे।’
 
2.
 
प्रश्न उठता है कि गांधी का यह प्रतिस्थापन क्या खादी आयोग के स्थानीय अधिकारियों के अतिउत्साह का नतीजा था - जैसा कि मीडिया के एक हिस्से में कहा जा रहा है - या यह पूरी कोशिश एक व्यापक योजना का हिस्सा है। अगर बारीकी से पड़ताल करने की कोशिश करें तो देख सकते हैं यह सबकुछ ‘भूलवश’ नहीं हुआ और इसके पीछे एक सुचिंतित सोच, योजना काम कर रही है। और गांधीजी की छवि को अपने में समाहित करने या उसे अब ‘विलुप्त’ करने की यह कवायद कई चरणों से गुजरी है। खादी आयोग का कैलेण्डर तो महज एक टेस्ट केस है। 
 
यह सर्वविदित है कि 2014 में जबसे भाजपा की हुकूमत बनी है तबसे गांधी के हत्यारे आतंकी गोडसे के महिमामंडन की कोशिशें कुछ ज्यादा ही परवान चढ़ी हैं। हिन्दु महासभा के लोगों द्वारा गोडसे के मंदिर बनाने से लेकर समय समय पर दिए जानेवाले विवादास्पद वक्तव्य गोया काफी न हों, ऐसे उदाहरण भी सामने आए हैं जब सत्ताधारी पार्टी के अग्रणी नेताओं तक ने गोडसे की तारीफ में कसीदे पढ़े हैं। दिलचस्प हैं कि एक तरफ गांधी को अपने प्रातःस्मरणीयों में शामिल करने के बावजूद उसके हत्यारे गोडसे के महिमामंडन को लेकर न भाजपा और न ही संघ ने कभी आपत्ति दर्ज करायी या न ही उसके जैसे एक आतंकवादी की छवि को निखारे जाने को लेकर कुछ कार्रवाई भी की। एक घोषित आतंकी के महिमामण्डन के माध्यम से हिंसा को बढ़ावा देने के लिए किसी के खिलाफ प्रथम सूचना रपट तक दर्ज नहीं की गयी है। 
 
निश्चित ही यह कोई पहला मौका नहीं रहा है कि पुणे का रहनेवाला आतंकी नाथुराम विनायक गोडसे, जो महात्मा गांधी की हत्या के वक्त हिन्दु महासभा से सम्बद्ध था, जिसने अपने राजनीतिक जीवन की शुरूआत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से की थी और जो संघ के प्रथम सुप्रीमो हेडगेवार की यात्राओं के वक्त उनके साथ जाया करता था, उसके महिमामण्डन की कोशिशें सामने आयी थी। महाराष्ट्र एवं पश्चिमी भारत के कई हिस्सों से 15 नवम्बर के दिन - जिस दिन नाथुराम को फांसी दी गयी थी- हर साल उसका ‘शहादत दिवस’ मनाने के समाचार मिलते रहते हैं। मुंबई एवं पुणे जैसे शहरों में तो नाथुराम गोडसे के ‘सम्मान’ में सार्वजनिक कार्यक्रम भी होते हैं। लोगों को यह भी याद होगा कि वर्ष 2006 के अप्रैल में महाराष्ट्र के नांदेड में बम बनाते मारे गए हिमांशु पानसे और राजीव राजकोंडवार के मामले की तफ्तीश के दौरान ही पुलिस को यह समाचार मिला था कि किस तरह हिन्दुत्ववादी संगठनों के वरिष्ठ नेता उनके सम्पर्क में थे और आतंकियों का यह समूह हर साल ‘नाथुराम हौतात्म्य दिन’ मनाता था। गोडसे का महिमामण्डन करते हुए ‘मी नाथुराम बोलतोय’ शीर्षक से एक नाटक का मंचन भी कई साल से हो रहा है।  
 
हम याद कर सकते हैं कि लोकसभा चुनावों के ठीक पहले 30 जनवरी को 2014 को महात्मा गांधी की हत्या के 66 साल पूरे होने के अवसर पर किस तरह गांधी के हत्यारे नाथुराम गोडसे की आवाज़ मंे एक आडियो वाटस अप पर मोबाइल के जरिए लोगों तक पहुंचाया गया। अख़बार के मुताबिक ऐसा मैसेज उन लोगों के मोबाइल तक पहुंच चुका था, जो एक बड़ी पार्टी से ताल्लुक रखते हैं और वही लोग इसे आगे भेज रहे थे। मेसेज की अन्तर्वस्तु गोडसे के स्पष्टतः महिमामण्डन की दिख रही थी, जिसमें आज़ादी के आन्दोलन के कर्णधार महात्मा गांधी की हत्या जैसे इन्सानदुश्मन कार्रवाई को औचित्य प्रदान करने की कोशिश की गयी थी। इतनाही नहीं एक तो इस हत्या के पीछे जो लम्बी चौड़ी सााजिश चली थी, उसे भी दफनाने का तथा इस हत्या को देश को बचाने के लिए उठाए गए कदम के तौर पर प्रस्तुत करने की कोशिश की गयी थी।
 
क्या गोडसे के महिमामंडन पर ‘आधिकारिक चुप्पी’ इसी बात का परिचायक थी कि उस प्रसंग के खुलते ही संघ परिवार के लिए कई सारे असहज करनेवाले प्रश्न खड़े हो जाते हैं ? हर अमनपसन्द एवं न्यायप्रिय व्यक्ति इस बात से सहमत होगा कि महात्मा गांधी की हत्या आजाद भारत की सबसे पहली आतंकी कार्रवाई कही जा सकती है। गांधी हत्या के महज चार दिन बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर पाबन्दी लगानेवाला आदेश जारी हुआ था -जब वल्लभभाई पटेल गृहमंत्राी थे - जिसमें लिखा गया था:
 
संघ के सदस्यों की तरफ से अवांछित यहां तक कि खतरनाक गतिविधियों को अंजाम दिया गया है। यह देखा गया है कि देश के तमाम हिस्सों में संघ के सदस्य हिंसक कार्रवाइयों में - जिनमें आगजनी, डकैती, और हत्याएं शामिल हैं - मुब्तिला रहे हैं और वे अवैध ढंग से हथियार एवं विस्फोटक भी जमा करते रहे हैं। वे लोगों में पर्चे बांटते देखे गए हैं, और लोगों को यह अपील करते देखे गए हैं कि वह आतंकी पद्धतियों का सहारा लें, हथियार इक्ट्ठा करें, सरकार के खिलाफ असन्तोष पैदा करे ..
 
27 फरवरी 1948 को प्रधानमंत्राी जवाहरलाल नेहरू को लिखे अपने ख़त में -जबकि महात्मा गांधी की नथुराम गोडसे एवं उसके हिन्दुत्ववादी आतंकी गिरोह के हाथों हुई हत्या को तीन सप्ताह हो गए थे - पटेल लिखते हैं:
 
सावरकर के अगुआईवाली हिन्दु महासभा के अतिवादी हिस्से ने ही हत्या के इस षडयंत्रा को अंजाम दिया है ..जाहिर है उनकी हत्या का स्वागत संघ और हिन्दु महासभा के लोगों ने किया जो उनके चिन्तन एवं उनकी नीतियों की मुखालिफत करते थे।’’ 
 
वही पटेल 18 जुलाई 1948 को हिन्दु महासभा के नेता एवं बाद में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सहायता एवं समर्थन से भारतीय जनसंघ की स्थापना करनेवाले श्यामाप्रसाद मुखर्जी को लिखते हैं: 
 
‘..हमारी रिपोर्टें इस बात को पुष्ट करती हैं कि इन दो संगठनों की गतिविधियों के चलते खासकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चलते, मुल्क में एक ऐसा वातावरण बना जिसमें ऐसी त्रासदी (गांधीजी की हत्या) मुमकिन हो सकी। मेरे मन में इस बात के प्रति तनिक सन्देह नहीं कि इस षडयंत्रा में हिन्दु महासभा का अतिवादी हिस्सा शामिल था। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की गतिविधियां सरकार एवं राज्य के अस्तित्व के लिए खतरा हैं। हमारे रिपोर्ट इस बात को पुष्ट करते हैं कि पाबन्दी के बावजूद उनमें कमी नहीं आयी है। दरअसल जैसे जैसे समय बीतता जा रहा है संघ के कार्यकर्ता अधिक दुस्साहसी हो रहे हैं और अधिकाधिक तौर पर तोडफोड/विद्रोही कार्रवाइयों में लगे हैं।"
 
प्रश्न उठता है कि गांधी के हत्यारे अपने इस आपराधिक काम को किस तरह औचित्य प्रदान करते हैं। उनका कहना होता है कि गांधीजी ने मुसलमानों के लिए अलग राज्य के विचार का समर्थन दिया और इस तरह वह पाकिस्तान के बंटवारे के जिम्मेदार थे, दूसरे, मुसलमानों का ‘अड़ियलपन’ गांधीजी की तुष्टिकरण की नीति का नतीजा था, और तीसरे, पाकिस्तान द्वारा कश्मीर पर किए गए आक्रमण के बावजूद, गांधीजी ने सरकार पर दबाव डालने के लिए इस बात के लिए अनशन किया था कि उसके हिस्से का 55 करोड़ रूपए वह लौटा दे।
 
ऐसा कोईभी व्यक्ति जो उस कालखण्ड से परिचित होगा बता सकता है कि यह सभी आरोप पूर्वाग्रहों से प्रेरित हैं और तथ्यतः गलत हैं। दरअसल, साम्प्रदायिक सद्भाव का विचार, जिसकी हिफाजत गांधी ने ताउम्र की, वह संघ, हिन्दु महासभा के हिन्दु वर्चस्ववादी विश्वदृष्टिकोण के खिलाफ पड़ता था और जबकि हिन्दुत्व ताकतों की निगाह में राष्ट्र एक नस्लीय/धार्मिक गढंत था, गांधी और बाकी राष्ट्रवादियों के लिए वह इलाकाई गढंत था या एक ऐसा इलाका था जिसमें विभिन्न समुदाय, समष्टियां साथ रहती हों।
 
दुनिया जानती है कि किस तरह हिन्दु अतिवादियों ने महात्मा गांधी की हत्या की योजना बनायी और किस तरह सावरकर एवं संघ के दूसरे सुप्रीमो गोलवलकर को नफरत का वातावरण पैदा करने के लिए जिम्मेदार ठहराया जा सकता है, जिसकी परिणति इस हत्या में हुई। सच्चाई यह है कि हिन्दुत्व अतिवादी गांधीजी से जबरदस्त नफरत करते थे, जो इस बात से भी स्पष्ट होता है कि नाथुराम गोडसे की आखरी कोशिश के पहले चार बार उन्होंने गांधी को मारने की कोशिश की थी। (गुजरात के अग्रणी गांधीवादी चुन्नीभाई वैद्य के मुताबिक हिन्दुत्व आतंकियों ने उन्हें मारने की छह बार कोशिशें कीं)। 
 
अगर हम गहराई में जाने का प्रयास करें तो पाते हैं कि उन्हें मारने का पहला प्रयास पुणे में (25 जून 1934) को हुआ जब वह कार्पोरेशन के सभागार में भाषण देने जा रहे थे। उनकी पत्नी कस्तुरबा गांधी उनके साथ थीं। इत्तेफाक से गांधी जिस कार में जा रहे थे, उसमें कोई खराबी आ गयी और उसे पहुंचने में विलम्ब हुआ जबकि उनके काफिले में शामिल अन्य गाडियां सभास्थल पर पहुंचीं जब उन पर बम फेंका गया। इस बम विस्फोट ने कुछ पुलिसवालों एवं आम लोग घायल हुए।
 
महात्मा गांधी को मारने की दूसरी कोशिश में उनका भविष्य का हत्यारा नाथुराम गोडसे भी शामिल था। गांधी उस वक्त पंचगणी की यात्रा कर रहे थे, जो पुणे पास स्थित एक हिल स्टेशन है (मई 1944) जब एक चार्टर्ड बस में सवार 15-20 युवकों का जत्था वहां पहुंचा। उन्होंने गांधी के खिलाफ दिन भर प्रदर्शन किया, मगर जब गांधी ने उन्हें बात करने के लिए बुलाया वह नहीं आए। शाम के वक्त प्रार्थनासभा में हाथ में खंजर लिए नाथुराम गांधीजी की तरफ भागा, जहां उसे पकड़ लिया गया।
 
सितम्बर 1944 में जब जिन्ना के साथ गांधी की वार्ता शुरू हुई तब उन्हें मारने की तीसरी कोशिश हुई। जब सेवाग्राम आश्रम से निकलकर गांधी मुंबई जा रहे थे, तब नाथुराम की अगुआई में अतिवादी हिन्दु युवकों ने उन्हें रोकने की कोशिश की। उनका कहना था कि गांधीजी को जिन्ना के साथ वार्ता नहीं चलानी चाहिए। उस वक्त भी नाथुराम के कब्जे से एक खंजर बरामद हुआ था।
 
गांधीजी को मारने की चौथी कोशिश में (20 जनवरी 1948) लगभग वही समूह शामिल था जिसने अन्ततः 31 जनवरी को उनकी हत्या की। इसमें शामिल था मदनलाल पाहवा, शंकर किस्तैया, दिगम्बर बड़गे, विष्णु करकरे, गोपाल गोडसे, नाथुराम गोडसे और नारायण आपटे। योजना बनी थी कि महात्मा गांधी और हुसैन शहीद सुरहावर्दी पर हमला किया जाए। इस असफल प्रयास में मदनलाल पाहवा ने बिडला भवन स्थित मंच के पीछे की दीवार पर कपड़े में लपेट कर बम रखा था, जहां उन दिनों गांधी रूके थे। बम का धमाका हुआ, मगर कोई दुर्घटना नहीं हुई, और पाहवा पकड़ा गया। समूह में शामिल अन्य लोग जिन्हें बाद के कोलाहल में गांधी पर गोलियां चलानी थीं, वे अचानक डर गए और उन्होंने कुछ नहीं किया।
 
उन्हें मारने की आखरी कोशिश 30 जनवरी को शाम पांच बज कर 17 मिनट पर हुई जब नाथुराम गोडसे ने उन्हें सामने से आकर तीन गोलियां मारीं। उनकी हत्या में शामिल सभी पकड़े गए, उन पर मुकदमा चला और उन्हें सज़ा हुई। नाथुराम गोडसे एवं नारायण आपटे को सज़ा ए मौत दी गयी, (15 नवम्बर 1949) जबकि अन्य को उमर कैद की सज़ा हुई। इस बात को नोट किया जाना चाहिए कि जवाहरलाल नेहरू तथा गांधी की दो सन्तानों का कहना था कि वे सभी हिन्दुत्ववादी नेताओं के मोहरे मात्रा हैं और उन्होंने सज़ा ए मौत को माफ करने की मांग की। उनका मानना था कि इन हत्यारों को फांसी देना मतलब गांधीजी की विरासत का असम्मान करना होगा जो फांसी की सज़ा के खिलाफ थे। ..
 
3.
 
बहरहाल गांधीजी के नाम की इस कदर लोकप्रियता थी कि संघ या उसके प्रचारकों के लिए इससे आधिकारिक तौर पर दूरी बनाए रखना लम्बे समय तक मुमकिन नहीं था, लिहाजा उन्होंने उनके नाम को अपने प्रातःस्मरणीयों में शामिल किया, अलबत्ता वह इस नाम से तौबा करने या उसके न्यूनीकरण करने की कोशिश में लगातार मुब्तिला रहे।
 
अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्रित्व काल की दो घटनाओं पर रौशनी डालना इस सन्दर्भ में समीचीन होगा, जो बताती हैं कि किस तरह अपने लिए एक ‘सूटेबल’ /अनुकूल गांधी गढ़ने की उनकी पुरजोर कोशिश रही है। उदाहरण के तौर पर उन दिनों गांधी जयंति पर सरकार की तरफ से एक विज्ञापन छपा था, जिसमंे गांधी के नाम से एक वक्तव्य उदध्रत किया गया था, जो तथ्यत‘ गलत था अर्थात गांधीजी द्वारा दिया नहीं गया था और दूसरे वह हिन्दुत्व की असमावेशी विचारधारा एवं नफरत पर टिकी कार्रवाइयों को औचित्य प्रदान करता दिखता था। जब उस वक्तव्य पर हंगामा मचा तब सरकार की तरफ से एक कमजोर सी सफाई दी गयी।
 
गांधीजी की रचनाओं के ‘पुनर्सम्पादन’ की उनकी कोशिश भी उन्हीं दिनों उजागर हुई थी, जिसके बेपर्द होने पर तत्कालीन सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे। इकोनोमिक एण्ड पोलिटिकल वीकली जैसी स्थापित पत्रिका में गांधी विचारों के जानकार विद्वान त्रिदिप सुहरूद ने इसे लेकर एक लम्बा लेख भी लिखा था।  ( http://www.epw.in/journal/2004/46-47/commentary/re-editing-gandhis-collected-works.html#sthash.8LRVLB1x.dpuf) जिसमें उन्होंने तथ्यों के साथ यह बात प्रमाणित की थी कि 

महात्मा गांधी की संकलित रचनाओं के पुनर्सम्पादन की यह कवायद अपारदर्शी और दोषपूर्ण है और एक ऐसी अकार्यक्षमता और बेरूखी का प्रदर्शन करती है जिसके चलते संशोधित प्रकाशन को स्टेण्डर्ड सन्दर्भ ग्रंथ नहीं माना जा सकेगा। इस नए संस्करण को खारिज किया जाना चाहिए और मूल संकलित रचनाओं को गांधी की रचनाओं एवं वक्तव्यों के एकमात्रा और सबसे आधिकारिक संस्करण के तौर पर बहाल किया जाना चाहिए।
 
या हम याद कर सकते हैं कि ‘‘क्लीेन इंडिया’ के नाम पर 2014 को गांधी जयंति पर शुरू की गयी मुहिम को जिसमें भी बेहद स्मार्ट अंदाज़ में गांधीजी की छवि का एक अलग न्यूनीकरण सामने आया था। चन्द विश्लेषकों ने इस बात की तरफभी बखूबी इशारा किया था कि उपनिवेशवाद और हर किस्म के सम्प्रदायवाद के खिलाफ उनकी तरफ से ताउम्र चले संघर्ष को लगभग भूला देते हुए महात्मा गांधी की विरासत को इस अभियान के तहत महज ‘सफाई’ तक न्यूनीक्रत किया गया था और अतीत के असुविधाजनक दिखनेवाले पन्नों की भी ‘सफाई’ करने की कोशिश की गयी थी। यशस्वी कहे गये प्रधानमंत्राी की अगुआई में शुरू इस अभियान के जरिए एक अलग किस्म के साफसुथराकरण अर्थात सैनिटायजेशन से हम सभी रूबरू थे, जिसके जरिए हमारे समाज के एक समरस चित्र प्रस्तुत करने की कोशिश हो रही थी जिसमें सफाई या उसका अभाव ‘भारत माता’ की तरफ हमारे ‘कर्तव्य’ को ही उजागर करता दिख रहा था।
 
दिलचस्प है कि न्यूनीकरण की या समाहित करने की ऐसी कोशिशें महज गांधीजी के साथ नहीं चली हैं। डा अम्बेडकर, जिन्होंने ताउम्र हिन्दू धर्म की बर्बरताओं की मुखालिफत की और हिन्दु राष्ट के निर्माण को आज़ादी के लिए खतरा बताया, उन्हें भी इसी तरह हिन्दुत्व के असमावेशी दर्शन एवं व्यवहार का पोषक साबित किया जा रहा है। यह अकारण नहीं कि बीते छह दिसम्बर को डा अम्बेडकर के परिनिर्वाण दिवस के अवसर पर प्रकाशित सरकारी विज्ञापनों में कुछ स्थानों पर अम्बेडकर की तुलना में अपने आप को ‘अम्बेडकर का शिष्य’ बतानेवाले जनाब मोदी की तस्वीर बड़ी दिखाई दी थी।
 
लेकिन वह किस्सा फिर कभी !