जल-संकट (लातूर-ग्रामीण क्षेत्र)-3: जय जवान, मर किसान!

Written by Devesh Tripathi | Published on: May 16, 2016

 
कुछ लोग किसान आत्महत्याओं को फैशन बताते हैं, तो कुछ प्रेम-प्रसंगों को आत्महत्या का कारण बताते हैं.लातूर के जल-संकट की बात करने पर दिल्ली का पढ़ा-लिखा युवा कहता है कि लातूर-वासी जल का अपव्यय करते रहे होंगे. ऐसी संवेदनहीनता हमारे वक़्त में पहले कब देखी गई होगी? हम सब इतने संवेदनहीन हो चुके हैं कि किसान आत्महत्या हमारे लिए एक ख़बर है, पानी की कमी और सूखे से हो रही मौत हमारे लिए एक ख़बर है, लूह से हो रही मौत हमारे लिए एक ख़बर है, कई बार तो ख़बर भी नहीं.

हम तो हम जैसे हैं ही, हमारी सरकारें भी हमारे जैसी ही हैं; जो नवउदारवादी नीतियाँ लागू करती हैं और कृषि के नए तरीकों से किसानों को जानबूझकर नहीं जोड़ती. बीज संचित नहीं करने देती जिससे की बीज व्यापारियों का धंधा फले-फूले और हर वर्ष किसानों को हाथ फैलाना पड़े. जब साल-दर-साल सूखे की स्थिति गहराती जा रही थी तो मराठवाड़ा के किसान गन्ने की खेती के लिए ही क्यों मजबूर थे? क्या यह न माना जाए कि सरकारों का सरोकार चीनी मिलों के मालिकों के लिए है, किसानों के लिए नहीं? आज 750-800 फीट नीचे भी पानी का कोई पता नहीं है. जलस्तर एक दिन में तो इतना नीचे नहीं आया होगा.जिस इलाके में जल का इतना भारी संकट है, वहाँ धड़ल्ले से बोतल-बंद पानी बिकता रहता है. पानी के दलालों का कब्ज़ा पूरे शहर में दिखता है. सरकारी स्रोतों पर जल नहीं मिलेगा पर एक फोन कॉल करने पर महंगी दरों पर पानी के दलाल टैंकर लेकर आपके दरवाज़े पर पहुँच जायेंगे. यह सब तो शहरों के लिए है. भेजी जा रही ट्रेनें, नगर-निगम के टैंकर, पानी के दलाल सब लातूर-शहर के लिए हैं. तो ग्रामीण-क्षेत्रों का क्या? इन्हीं ख़यालों को मथते बीड़ से लौटकर हम वापस लातूर पहुँचे. गायत्री नगर वाले रामभाऊ हमें लातूर के गांवों में ले जाने वाले थे. लातूर बसस्थानक से हमने लातूर रोड के लिए बस पकड़ी. 18 किमी दूर जहाँ हम उतरे, मालूम चला कि गांव का नाम ही लातूररोड है. रामभाऊ के साथ लातूररोड गांव के ही दुर्गेश आ गये और गांव के कुंए पर ले गए. यह कुआं पहला जलस्रोत था जिसमें पानी के दर्शन हुए थे. कुंए की तली में बैठा,चमकता,गंदला.एक महिला घड़े को रस्सी के सहारे कुंए में उतार पानी खुरच-खुरच कर अपने घड़े में भरने की कोशिश कर रही थी. दुर्गेश भाऊ ने बताया कि गांव की आबादी 5000 है. फ़रवरी के बाद से जलस्तर 2 मीटर नीचे चला गया है.हर घर में बोर मिलेगा पर फ़रवरी के बाद से उसमें भी पानी नहीं आता है, उसके पहले थोड़ा-थोड़ा आ जाता था. इस इलाके में भी जलस्तर 700 फीट से भी नीचे चला गया है. 15 किमी दूर चाकुर तहसील के पास एक तालाब से पानी टैंकरों में भरकर गांव में पहुंचाया जाता है. पहले आओ, पहले पाओ वाला मामला चलता है. कई बार बहुत-से परिवारों को पानी नहीं मिल पाता है.आस-पास वन सावर गांव, सांगवी, मोहनाल, घरनी,बडमाल, चाकोर आदि गांव हैं.चाकोर के पास एक तालाब है, जो अब सूख चुका है. लातूर रोड गांव और इसके आस-पास के सभी गांवों ने उस सूखे तालाब में बोरिंग की है, जिससे हर रोज़ एक टैंकर एक गांव में जाता है.तालाब से औसतन 3 टैंकर पानी एक दिन में निकाला जाता है. दुर्गेश भाऊ ने बताया कि सरकार ने जनवरी में छोटे गांवों के लिए पानी के 2 टैंकर और लातूर रोड जैसे बड़े गांवों के लिए 3 टैंकर तय किये पर आज तक ऐसा हो नहीं पाया. पूरा गांव किसानी करता है पर 5 साल से खेती नहीं होती तो अब बहुत-से किसान मजदूरी करने लगे हैं, वहीं बहुत-से किसान मजदूर नहीं हो पा रहे हैं और आत्महत्या के मुहाने पर खड़े हैं. मैं देख रहा था कि कुंए से पानी भर रही महिला अब जा चुकी थी और दूसरी महिला घड़े और रस्सी लिए पानी भरने के लिए आ गई थी. मैंने रामभाऊ से पूछा, क्या गांव में कुंए से पानी भरने के लिए साझा रस्सी नहीं होती? अब अपनी-अपनी रस्सी ले आते हैं? रामभाऊ बोले,‘सब किसान हैं, अगर आत्महत्या करनी होगी तो क्या करेंगे? किसी और से तो रस्सी मांगने नहीं न जायेंगे.इसलिए सबके पास अपनी रस्सी होती है.’ इतना कहकर रामभाऊ जोर-से हँस पड़े और मैं मुस्कुरा भी नहीं पाया.



वहाँ से निकल बगल के गांव मोहनाल में गए हम. गांव के सरपंच ज्ञानेश्वर पांचाल (34 वर्ष) और उनकी माताजी लक्षमबाई पांचाल मिली. उनके घर के भीतर एक बावड़ी(कुआं) है, जिससे पूरा गांव पीने के लिए पानी ले जाता है. ज्ञानेश्वर बताते हैं कि 11 महीने से टैंकरों पर निर्भर है पूरा गांव. इसके पहले गांव में दो बोर हुआ करते थे जिससे पानी मिल जाता था. पर स्थितियां अब बदल चुकी हैं और ऐसा ही रहा तो गांव के लोग गांव छोड़कर कहीं और चले जायेंगे.नहीं गए तो क्या होगा के सवाल पर ज्ञानेश्वर की ऑंखें शून्य में कुछ कुरेदने लगती हैं, कुछ कहती नहीं. मोहनाल में एक परिवार मिला जिसमें मार्च महीने में आत्महत्या हुई थी. महिला किसान महादेवी राम मिरकले(35वर्ष) ने आत्महत्या कर ली थी. ज्ञानेश्वर बताते हैं कि घर में कुछ खाने को रह नहीं गया था, मजदूरी मिल नहीं रही थी, सहकारी बैंक क़र्ज़ 2 साल से क़र्ज़ देना बंद कर चुके हैं, साहूकार क़र्ज़ देते हैं पर इतने ज्यादा ब्याज पर कि ब्याज एक साल में मूलधन से ज्यादा हो चुका होता है.महादेवी के पति पैर से अपाहिज हैं.महादेवी के दो छोटे बच्चे हैं.

पिछले साल पूरे गांव ने पानी के टैंकर मंगवाकर टमाटर की खेती की थी पर उसमें भी नुकसान हो गया. जिसके कारण पूरे गांव की स्थिति अब कमजोर हो चुकी है. आप लोग जाकर प्रशासन को घेर क्यों नहीं लेते के सवाल पर ज्ञानेश्वर कहते हैं कि ऐसा ही कुछ करना पड़ेगा वरना इलाका छोड़ के जाना पड़ेगा. यहाँ रहेंगे और कुछ करेंगे नहीं तो सब मारे जायेंगे.



लातूर रोड, मोहनाल सहित आस-पास के ग्रामीणों ने मिलकर जनवरी में एक खेत में 6 बोर करवाए थे. आशा थी कि पानी मिलने लगेगा. पर ऐसा नहीं हुआ. एक बोर का खर्चा आया था 1.5 लाख रूपये. मतलब की पूरे 9 लाख रूपये डूब गए.

लौटते हुए हम सब चाय पी रहे थे.दुर्गेशभाऊ बता रहे थे कि पिछले 5 साल में चाकुर तहसील में 35 किसानों ने आत्महत्या की थी और इस साल के 5 महीनों में 32 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. सामने बैठा एक लड़का सिगरेट पी रहा था और मैं डिब्बी को देखकर बुदबुदा रहा था, ‘एग्रीकल्चर इज एन्जूरियस टू हेल्थ’.

कितनी तेज़ी से बदल गया है पूरा इलाका; स्थितियों के साथ-साथ, स्थितियों से कटा-कटा. 1993 से पहले तक इन इलाकों में 200 से अधिक संस्थाएँ काम करती थीं और आज गिनी चुनी एक-आध संस्थाएँ ही मिलती हैं, जिनका स्पष्ट तौर पर या तो कोई एजेंडा होता है या मिडिलक्लास रोमांटिसिस्म में पैसा बहाने चली आती हैं. जय जवान, जय किसान का नारा देने वाला हमारा देश किसान आत्महत्याओं पर चुप रहता है. हमारी देशभक्ति क्रिकेट मैच के परिणामों पर फड़कती रहती है पर हम किसान आत्महत्याओं पर टीवी नहीं फोड़ते. उबासी लेते आगे बढ़ जाते हैं. हमारा बौद्धिक वर्ग किसानों को अभिशप्त मानता है,किसान आत्महत्याओं पर कविता, कहानी, लेख, उपन्यास बहुत कुछ लिखा जाता है पर किसान कविताओं में आकर भी दम तोड़ देता है, कहानी में भी उसकी मौत होती है, लेखों में वह महज़ एक आकड़ा होता है, उपन्यासों में कुंए में कूदकर अपनी जान दे देता है. आप सोच रहे होंगे कि मैं जल-संकट की बात से किसान आत्महत्याओं पर कैसे पहुँच गया. इसका जवाब यही है कि पानी और खेत का रिश्ता बना रहे, बहुत जरूरी है. किसानों के जीवन का आधार है यह रिश्ता. आप अगर मेरी भावना से अब भी नहीं जुड़ पा रहे तो इसमें किसानों की गलती मत खोजिएगा, मेरी कमी मानियेगा.



Images: Devesh Tripathi and Anupam Sinha

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