अब्बा, हमें हौसला और हिम्मत देना- 1

Written by नशरीन जाफरी | Published on: June 7, 2016


मैं पूर्व सांसद एहसान जाफरी की बेटी हूं, जिन्हें गोधरा घटना के बाद शुरू हुए गुजरात कत्लेआम के दौरान 28 फरवरी, 2002 को उनके ही घर में बर्बर तरीके से जला कर मारा डाला गया। मेरे लिए आज भी यह यकीन करना मुश्किल है कि अब वे नहीं हैं, उन्हें इस तरह बेवक्त हमसे दूर कर दिया गया, बेहद क्रूरता और बर्बरता के साथ। चूंकि उन्हें जिंदा जला दिया गया और हमें उनका शरीर भी नहीं मिला, तो मैं अब भी उनकी मौत के बारे में नहीं सोचती। गुजरे तमाम दिनों के दौरान मैं भरोसे और नाउम्मीदियों, भाईचारे और इंसानियत में अविश्वास, हमारी विरासत के मूल्यों और ज्ञान के साथ-साथ गुजरात में अधर्म या अनैतिकता और कत्लेआम के सरेआम नाच के बीच बेतहाशा झूलती रही। इस बीच मैंने अपनी जड़ों और मजहब का सामना किया। मगर मेरे पिता से मिले सबक और मेरे परिवार को मिली ताकत का शुक्रिया कि मैंने फिर से अपना भरोसा और संतुलन हासिल किया है। बहुत थोड़ा ही सही, मैं अपने दुख से उबर सकी हूं।

बहुत थोड़ा, क्योंकि आज भी मैं अपने जज्बातों पर काबू रखने में नाकाम हो जाती हूं, जब मैं यह सब सोचने लगती हूं कि तलवार से कैसे उन्हें चीर डाला गया, वह आग जिसमें उन्हें जिंदा जला दिया गया, वे लोग जिन्होंने उन्हें मार डाला। लेकिन अब मैं आपके साथ अपने पिता की उन यादों को साझा कर सकती हूं कि वे मेरे लिए क्या थे, अपने परिवार, देश के लिए उन्होंने क्या-क्या सहा और कैसे हम सबको उन्होंने फख्र करने लायक बनाया।

वे मेरे हीरो थे। जिस पल भी मैं आंखें बंद करती हूं, मेरे बचपन के दिनों से लेकर मेरी शादी और विदेश जाने तक की मेरी जिंदगी के तमाम दौर किसी रील की तरह बार-बार दौड़ने लगते हैं। उस जिंदगी में वे हर पल मेरे साथ थे, और अब जब मैं यह चिट्ठी लिख रही हूं, वे मेरी हिम्मत और हौसले की शक्ल में मेरे साथ हैं।

मेरे प्यारे अब्बा, मैं आपसे बहुत प्यार करती हूं। हम सब आपसे प्यार करते हैं। हम सब आपको बहुत याद करते हैं। हम सब आपकी प्रतिबद्धता, आपके भरोसे, आपकी हिम्मत, आपके मूल्यों और त्याग के लिए आपका शुक्रिया अदा करते हैं। आपने हमें निस्वार्थी बनना और केवल खुद के बारे में नहीं सोचना सिखाया। अम्मी उस वाकये को याद करते हुए कभी नहीं थकतीं जब आप अपने पुराने घर के एक कमरे में सो रहे थे, तो एक लालटेन बिस्तर पर गिर गया था और बिस्तर में आग लग गई थी। उसी बिस्तर पर आप और अम्मी एक ओर सो रहे थे। अचानक महसूस होने पर आप जैसे ही जगे और आपने आग देखा, तो तुरंत बिस्तर पर से भागने के बजाय आपने अम्मी को जगा कर बचने के लिए कहा। लेकिन जब वे जगीं और आग देखा, तो तुरंत ही दरवाजे की ओर भागीं। उन्हें यह ध्यान नहीं रहा कि आप कहां थे और उन्हें क्या कहने की कोशिश कर रहे थे। अब इसके चालीस साल से ज्यादा गुजर चुके हैं, लेकिन अब भी वे उस वाकये को याद करती हैं और अफसोस से भर जाती हैं कि आग देख कर दरवाजे की ओर भागते हुए उन्होंने आपका हाथ क्यों नहीं पकड़ा।

लेकिन अट्ठाईस फरवरी को उस वक्त वे घर में ऊपर थीं, जब आप पर बर्बरता ढायी गई और जिंदा जला दिया गया। आप तब उन सैकड़ों मर्दों, औरतों और बच्चों को बचाने की कोशिश कर रहे थे, जिन्होंने हिंसक और कातिल भीड़ से जान बचाने के लिए आपके घर में पनाह ली हुई थी। वह अफसोस अब उनके लिए बर्दाश्त करने के काबिल नहीं है। उन्होंने देखा कि कैसे एक अलग हालात में चालीस साल पहले का वह वाकया फिर से सामने आ गया।          (जारी).....