अब्बा, हमें हौसला और हिम्मत देना- 2

Written by नशरीन जाफरी | Published on: June 9, 2016

Ahsan Jafri with Yashwant Rao Chauhan
आपकी लाइब्रेरी में कानून, साहित्य, दर्शनशास्त्र, इंसानियत, धर्म, राष्ट्रीय एकता और आपकी अपनी कविताओं की हजारों किताबें जो आपने अपनी अगली पीढ़ियों के लिए संभाल के रखी थीं, वे आपको समझने के लिए काफी थीं। वे सब खाक में तब्दील कर दी गईं। आपके दफ्तर में अब गौरैया नहीं हैं, उनके घोंसले जला दिए गए। मुझे याद है कि आपने अपने दफ्तर में गौरैयों को घोंसला बनाने, अंडे देने, उनके चूजों को उड़ान भरना सिखाने के लिए कितनी मेहनत की थी। आप अपने दफ्तर की एक खिड़की हमेशा ही खुला छोड़ देते थे, तब भी, जब हम सब समूचे घर को बंद कर कहीं बाहर गए होते। सिर्फ इसलिए कि गौरैया हमारे घरों में आजादी से आवाजाही कर सकें। जब वे गौरैया घोंसला बनाने के दौरान कुछ गंदगी फैलाती थीं, तो दिन में कई-कई बार आप अपने दफ्तर की सफाई खुशी-खुशी करते थे। जब उन गौरैयों को नन्हे चूजे होते थे, तो आप घर के पंखे चलाने वाले बिजली के स्विच पर टेप लगा देते थे, ताकि गलती से वे चल न जाएं। पंखों से चूजों के घायल होने की बनिस्बत आप गरमी को बर्दाश्त करके काम करना पसंद करते थे। हम आज भी उन गौरैयों को याद करते हैं।

मुझे याद है कि एक युवक कालिया जब अपने पांवों के जख्मों की तकलीफ से तड़प रहा था, तो आप उसे डॉक्टर के पास ले गए और खुद उसके घावों की मरहम-पट्टी की थी। उसने बताया था कि जिस वक्त कोई उसे छूने तक के लिए तैयार नहीं था, तब आपने उसे कुर्सी पर बिठा कर खुद नीचे बैठ उसके पांवों को देख रहे थे और तब वह खुद को शर्मिंदा महसूस कर रहा था। उन सालों के दौरान आपने जिनकी मदद की, उनमें से दर्जनों लोग आपकी रहमदिली और उदारता की याद दिलाते हैं। उनमें से कई यह भी जानते हैं कि कैसे आप उन्हें घरों का रंग-रोगन करने, दरवाजों को पेंट करने, किचेन या टॉयलेट या घर में गैराज को नई शक्ल देने के बारे में बताते थे। यह सब इसलिए नहीं कि वह जरूरी था, बल्कि इसलिए कि आप चाहते थे कि वे अपनी जिंदगी को बेहतर बनाने के लिए खुद कुछ काम करें। वे सभी आपको याद करते हैं।

अब्बा, मैं जानती हूं कि अगर आप चाहते तो अपनी वकालत की प्रैक्टिस और अपने सियासी कॅरियर के जरिए काफी पैसे कमा सकते थे। लेकिन इसके बजाय आपने हमारे हिंदुस्तानी स्वभाव के मुताबिक बिल्कुल सादा रहन-सहन और ऊंचे खयालातों की जिंदगी चुनी। अगर आप चाहते तो एक बहुत ताकतवर और रसूखदार सियासतदां हो सकते थे। लेकिन इसके बजाय आप अपने गुरु और आदर्श महात्मा गांधी के मूल्यों के साथ बने रहे और आपने देश के लोगों के लिए काम करने का रास्ता चुना। सांप्रदायिक एकता और सौहार्द, राष्ट्रीय एकता और इंसानी गरिमा पर आपकी लिखी कविताएं आने वाली पीढ़ियों को रास्ता दिखलाती रहेंगी।

यह आपकी उम्मीदों और सकारात्मक सोच के साथ तैयार मेरी शख्सियत है कि मैंने देश में प्यार, भाईचारा, सुकून और सांप्रदायिक सौहार्द के हालात को देखना पसंद किया है। मैंने यह भरोसा चुना कि गुजरात में हमने जो हिंसा और सांप्रदायिक असहनशीलता देखी, वह महज एक तात्कालिक विचलन थी और उसके गम जल्दी ही गुजर जाएंगे।

आपने न जाने कितने दिलों को छुआ। ज्यादातर हिंदुओं और मुसलमानों ने साथ आकर आपके लिए दुख जताया। आप शांति के एक दूत थे, इंसानियत और इंसानी गरिमा के पैरोकार थे। खुद को हिंदू मानने वाले चंद भटकाए गए लोगों ने गुजरात और गुलबर्ग सोसाइटी में आपके और हजारों मासूम निर्दोष लोगों के साथ जो किया, उस पर हमारे ज्यादातर हिंदू दोस्तों ने अफसोस और शर्मिंदगी जताई। गुनाह का एहसास और उसका बोझ अपने दिल पर लिए ये दोस्त अक्सर हमारे पास आकर गुजरात कत्लेआम के लिए हमसे माफी मांगते। मगर जैसा आप भी करते, उसी तरह हमने उन्हें कहा कि आप वे नहीं हैं जिन्हें इसके लिए बोझ महसूस करना चाहिए।

यह हिंदुत्व नहीं है। उस कत्लेआम के लिए यह हिंदुत्व जिम्मेदार नहीं और इस पर आरोप नहीं लगाया जाना चाहिए। भटकाए गए कुछ अतिवादी दरअसल चरमपंथी हैं और चरमपंथ के पीछे चलने वालों का अपना ही मजहब होता है। हिंदू दरअसल मासूम, रहमदिल, भगवान से डरने वाले और कानूनों के मुताबिक चलने वाले नागरिक होते हैं, ठीक उन मुसलमानों की तरह जिन्हें उन चरमपंथियों ने गुजरात में निशाना बनाया और मार डाला। हमने यहां और सभी जगहों पर अपने सभी दोस्तों को यही बताया है। हम उन्हें प्यार करते हैं, उनकी और हमारी तहजीब के लिए उनकी नेकनीयती की इज्जत करते हैं। यही तो आपने भी किया था। हम उनके सराकारों को साझा करेंगे और इस समाज और देश में फासीवाद और नफरत का जहर फैलाने वालों के खात्मे के लिए काम करेंगे।

(जारी)......

अब्बा, हमें हौसला और हिम्मत देना- 1