मीडिया, राजनीति और बहुजन II

Written by Dilip Mandal | Published on: February 4, 2017
चैनल का पैनल!

आज बजट पेश हुआ। चैनलों पर सब मिलाकर सैकड़ों एक्सपर्ट आए और आएँगे।

मैं सोच रहा हूँ कि किसी टीवी पैनल में प्रोफ़ेसर सुखदेव थोराट जैसा कोई विद्वान क्यों नहीं है? इकॉनॉमिक्स में पीएचडी। जेएनयू में इकॉनोमिक्स के प्रोफ़ेसर। यूनिवर्सिटी ग्रांट कमीशन के चेयरमैन। ICSSR के चेयरमैन।

आर्थिक मामलों पर इस क्वालिफ़िकेशन और अनुभव का कोई और आदमी इस समय भारत में नहीं है।

अर्थव्यवस्था, खेती, स्लम्स, आर्थिक असमानता पर विश्वस्तरीय लेखन।

लेकिन प्रोफ़ेसर थोराट अर्थव्यवस्था पर बोलने के लिए किसी चैनल पर कभी नहीं बुलाए गए। एक बार भी नहीं।

ऐसा क्यों है कि सुखदेव थोराट सिर्फ दलित उत्पीड़न के सवाल पर बोलने के लिए बुलाए जाते हैं?

चैनलों पर ऐसे विद्वान का परिचय अर्थशास्त्री नहीं, दलित चिंतक है।

ग़लत है।



        


मान्यवर कांशीराम से किसी को राजनीतिक मतभेद हो सकता है। मतभेद कोई बुरी बात भी नहीं है। लोकतंत्र है। होना चाहिए।

लेकिन इस तथ्य से कैसे इनकार किया जा सकता है कि उस शख़्स ने शून्य से शुरुआत कर देखते ही देखते वोट के हिसाब से, देश की तीसरी सबसे बड़ी पार्टी खड़ी कर दी। वह भी धन और जाति श्रेष्ठता की ताक़त के बग़ैर। उस पार्टी ने एकाधिक बार देश के सबसे बड़े राज्य की सत्ता भी सँभाली।

राजनीतिशास्त्र के कई अध्येता मानते हैं कि समाज के सबसे नीचे के तबके को सत्ता के केंद्र में पहुँचाकर उन्होंने लोकतंत्र का विस्तार किया और देश इससे मज़बूत हुआ।

उनकी कई कारणों से आलोचना भी ख़ूब हुई। लेकिन राजनीति पर उनके असर से कौन इनकार कर सकता है?

क्या आप जानते हैं कि अपने दौर के सबसे क़द्दावर नेताओं में से एक, कांशीराम की मृत्यु के बाद मीडिया ने क्या किया?

किसी बड़ी लाइब्रेरी में जाकर 10 अक्टूबर, 2006 का The Hindu अखबार निकालिए। यह अखबार ख़ुद को महान मानता है और कई लोग इसे सेकुलर, प्रगतिशील मानते हैं।

इस अख़बार में मान्यवर कांशीराम के गुज़रने की ख़बर 14वें पन्ने पर है।

वह भी नीचे। कोने में।

जब इसकी आलोचना हुई तो अखबार ने माना कि ग़लती हुई। ख़बर उस पन्ने पर नीचे नहीं, ऊपर छापनी चाहिए थी!

यही मीडिया का सच है (जारी)....

अगला भाग - वी. पी. सिंह के मरने की ख़बर

The Hindu का माफ़ीनामा।
Dear Mr. Ravikumar,
Thank you for a detailed note of anguish.
Obviously you did not notice Kanshi Ram`s picture with the headline "Kanshi Ram passes away" on Page 1, just below the masthead, what are pointers to the most important stories inside.
The news was prominently displayed in a four-column spread. It should have been on top of the page. This was an error of judgment, which does happen in a newspaper at times. What was really missed was a detailed obituary.
This has been more than made up today by the long assessment (Op-Ed page) of the phenomenon that Kanshi Ram was, and also an editorial.
What is really uncharitable, as far as The Hindu is concerned, is your comment that this was "symbolic of the status dalits are meant to enjoy." This paper, I feel, has always been sympathetic to the Dalit cause.
K. Narayanan
The Readers` Editor,
The Hindu,
Kasturi Buildings,
859 -- 860 Anna Salai,
Chennai 600 002
India